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*पूंजीपतियों की उंगली के इशारों पर नाच रहे तंत्र के कारिंदे?:नरसिंहपुर*

जिले के मौजूदा हालात पर यदि आप सरसरी नजर डालें तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल आपके मन मस्तिष्क में भी कभी ना कभी तो उठता ही होगा!बशर्ते आपके अंदर का नागरिक बोध पूरी तरह से खत्म ना कर दिया गया हो! अन्यथा आप एक वोटिंग मशीन से अधिक और कुछ भी नही रह जायेंगे!इसलिए सवाल करते रहिए और साथ ही जवाबों पर भी नजर रखिए !हो सकता है आपकी इस कोशिश से नागरिक बोध के साथ ही लोकतंत्र भी जिंदा रह सके!

हाल ही में जिले के ग्रामीण अंचल से पंचायत में हुए गबन का मामला जोर शोर से उठा और उतनी ही जल्दी खामोशियों के सन्नाटे में गुम हो गया! एक और शिकायत भ्रष्टाचार के सैलाब में डूब कर दफन हो गई!भ्रष्टाचारियों के गले का फंदा ढीला हो गया और शिकायत कर्ता की मौज हो गई!कथित तौर पर सामने आया कि,विज्ञापन का कुछ हिस्सा मीडिया तक भी पहुंचा!जो की बिलकुल भी नई बात नही है!ऐसी चर्चाएं गाहे बगाहे उठती रहती है और कई बार इनमें सच्चाई का पुट भी होता है!

लेकिन इन सबके बीच जो सबसे खास बात है, उस पर किसी की नजर नही जाती? वह यह है कि,जब शिकायतें उठ रही थी,आवाजें दब रही थी और मामले पर सौदेबाजी हो रही थी,तब तंत्र के कारिंदे क्या कर रहे थे?क्या ये अपने कर्तव्य का निर्वहन कर भी रहे थे?देश और जनता की सेवा करने की शपथ लेकर भी आखिर क्यों नही अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी गई?कहीं ये अफसरशाहों की तानाशाही तो नहीं है?

हालिया घटनाओं पर नजर डालें तो हम पाते हैं की,तंत्र के कारिंदे पूंजीपति वर्ग के इशारे पर नाच रहे हैं!तंत्र के इन कारिंदों की डोर पूंजीपतियों के हाथों में हैं!जिसे जब चाहे ,जैसी मर्जी नचाया जा सकता है!उदाहरण के तौर पर इसे यहां ऐसे समझिए कि अक्सर कहा जाता है,कानून गरीब के लिए है!इसका आशय क्या है?क्या वाकई कानून गरीब के लिए है?या फिर सिर्फ गरीब के लिए है?कभी आसपास की घटनाओं पर गौर करके देखिए तो आपको इसके अनेकों उदाहरण देखने के लिए मिल जायेंगे!जिनमें आपका जवाब भी छिपा हो सकता है!

शिकायतों पर कार्यवाही क्यों नही होती?उम्मीद है आपको अब तक इस बात का जवाब भी मिल गया होगा!और यदि अब तक जवाब ना मिला हो तो ,आप भी लिफाफा पहुंच गया होगा" कहकर इसे समझने का दावा तो कर ही सकते हैं!हालाकी मामला सिर्फ इतना सा नही है की,लिफाफा पहुंच गया और बात खत्म हो गई!

दरअसल लिफाफा पहुंच जाने का मतलब यह हुआ कि,फरमाइशी प्रोग्राम चालू है,सिर्फ मन माफिक सौदे की बात है? जो डोर खींचेगा ,फैसला उसके पक्ष में हो ही जाना है! तो यहां जाहिर तौर पर हम देख सकते हैं की,किस तरह तंत्र के कारिंदे पूंजीपति वर्ग के हाथों से बंधी डोर के सहारे चल रहे हैं!

अगर एक शिकायत कर्ता गबन पर सौदा कर लेता है और पूरा की पूरा तंत्र मिलकर सरपंच क्लीनचिट देने की तैयारी में पहले से ही जुटा हुआ हो,और तंत्र के कारिंदे भेड़ चाल पर उतारू हो गए हों,तब किसी भी स्थिति में ऐसे मामले को छोटा गबन का मामला कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है!दरअसल इस तरह के मामले न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं!ऐसे में यह सवाल उठता है कि,क्या पूंजीपति वर्ग को न्याय प्रणाली की इस प्रक्रिया से खिलवाड़ करने का अधिकार प्राप्त है?

इसे किसी भी तरह से संक्षेप में आप तक पहुंचाना संभव नहीं है,यदि आपको इसे गहराई तक समझना है तो मामले को विस्तार से पढ़ना ही होगा।क्यों की यह आपके जिले की बात है,किसी विज्ञापन की टैग लाइन नही!और वह भी तब जब की एक पंच वर्षीय कार्यकाल में ग्रामीण अंचलों में अस्सी करोड़ रुपए से अधिक का गबन हो जाता हो!




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