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सांकेतिक चित्र।

नरसिंहपुर।

सरपंच सचिव और अधिकारी प्रलोभन से लेकर धमकियां देने से भी नही कतरा रहे हैं।क्या यही है नरसिंहपुर जिले के विकास की असली तस्वीर?विकास को यहां तमाशा बना दिया है।शिकायतों और न्याय व्यवस्था का मखौल उड़ाया जा रहा है।

ग्राम पंचायत पलेरा के मामले में खुफिया सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार ग्राम रोजगार सहायक ने अधिकारियों की मिलीभगत से ग्रामीणों के विकास के लिए आई राशि की जमकर बंदर बांट की गई। जीआरएस द्वारा किया गया यह सारा गोलमाल सरपंच और सचिव की नजर से कैसे बच गया?क्या सरपंच और सचिव की जानकारी के बिना जीआरएस अपने परिवार को अवैध तरीके से लाभ पहुंचा सकता था?

चिचली जनपद सीईओ बी आर उइके क्या मामले पर कोई सख्त एक्शन ले पाएंगे?या फिर अधिकारियों तक रिश्वत पहुंचने की बात होगी सच साबित?

क्यों की पूरा सिस्टम ही भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए एडी चोटी का जोर लगा रहा है?कैसी विडंबना है कि आम नागरिक के हितों की अनदेखी की जा रही है और भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण दिया जा रहा है।ऐसा नहीं है की गबन सिर्फ ग्राम पंचायत सिमरिया कला या फिर ग्राम पंचायत पलेरा में ही हुआ है बल्कि ग्राम पंचायत घाट पिंडरई,मेहगुवा निजोर,मारेगांव,बागसपुर में भी जमकर मलाई डकारी गई।

कितनी हैरत की बात है ना, गांवो में चुने हुए प्रतिनिधि और जनता की सेवा करने वाले शासकीय सेवक तानाशाह बनते जा रहे हैं।यहां सच लिखना बोलना और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना गुनाह हो गया है?आप अपने ही जिले और जिलेवासियों के साथ अन्याय कर रहे हैं।शिकायत कर्ताओं की आवाज दबाने की कोशिश यह बता रही है कि भ्रष्टाचार नरसिंहपुर जिले में अपने चरम पर है।लोगों ने भय के कारण अपनी जबान बंद रखना ही मुनासिब समझा है,आखिर लोग जाएं भी तो कहां?किससे शिकायत करें?किससे न्याय की गुहार लगाएं?

पंचायत में व्याप्त भ्रष्टाचार और विकास कार्यो के लिए संघर्ष की वजह से शिकायत कर्ताओं को प्रताड़ित किया जा रहा है।

पंचायत में चल रहे भ्रष्टाचार की लगातार शिकायतों के बाद भी प्रशासन इस ओर से पूरी तरह से आंख मूंदे हुए है।प्रशासन का रवैया देखकर नहीं लगता है कि कार्यवाही जल्द होगी और प्रशासन निष्पक्ष व पारदर्शी जांच करेगा।

अब भले ही शहर और गांव की जमीनी हकीकत कुछ कह रही हो, लेकिन उन सभी तथ्यों को ठुकराकर आंकड़ों में विकास दिखाना कोई मामूली बात है क्या!

और फिर जब कागज कह रहे हों तो मानना ही पड़ेगा कि सबका विकास हो रहा है, वैसे भी आम आदमी के ना मानने से फर्क ही कहां पड़ता है?

अधिकारी रिश्वत ले रहे हैं,पंचायतों में गबन पर संरक्षण की छाया है, मनरेगा कमाई की योजना बन गई, प्र. मं. आ. में व्यापक पैमाने पर गोलमाल हुई,गरीबों के हिस्से का राशन अपात्रों की झोली में गया जैसे मुद्दे बेमानी हो गए हैं?

चोर चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर मामलों पर पर्दा डालने को भलाई समझने वाले जिम्मेदार महज कठपुतली का किरदार निभा रहे हैं।जिस तरह डोर खींची जायेगी पलड़ा उसी तरफ झुक जायेगा।

जब पूरा सिस्टम ही करप्शन की दीमक ने खोखला कर दिया हो तब उस सिस्टम की व्यवस्थाओं का क्या हाल होगा यह आप शायद समझकर भी नही समझ सकते हैं!

अनगिनत शिकायतों के पुलिंदे में से चंद शिकायतों पर कार्यवाही कर वाहवाही बटोरने का हुनर क्या इतनी आसानी से आ जाता है।

आम जनता कुछ भी कह रही हो उसे अनसुना कर अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले तंत्र में बैठे कारिंदे मेवा डकारने के लिए सेवा का अभिनय करने में इस कदर माहिर हैं कि लगता है बस विकास मिल ही गया अब चारो ओर सुशासन होगा।

विकास की लहर को शहर और होर्डिंग या फ्लेक्स पर ही महसूस किया जा सकता है।ग्रामीण और पहाड़ी अंचल में आप विकास की सच्चाई देख सकते हैं।आज भी वहां जीवन कितना दुष्कर है,सुविधाओं के नाम पर चमचमाते सरकारी भवन तो हैं लेकिन कई स्थानों पर कर्मचारी ही नहीं है और जहां हैं वहां के हाल किसी से छिपे हुए नहीं हैं।

यदि एक भी पंचवर्षीय का पूरा पैसा और ईमानदारी के साथ मेहनत की गई होती तो विकास की तस्वीर बदल भी सकती थी। एक गांव तमाम सुविधाओं से लैस होकर स्मार्ट गांव बनने की राह पर चल सकता था लेकिन भ्रष्टाचार की दीमक विकास की मंशा को ही चाट गई है।

सच कहूं तो ऐसा लगता है जैसे अधिकारी भ्रष्टाचार के मामलों को गंभीरता से लेना ही नही चाहते।यह एक बड़ी विडंबना है।यदि आप भ्रष्टाचार की शिकायतों के कार्यवाहियों के पैटर्न और उनके आंकड़ों पर गौर करें तो समझ सकेंगे की अधिकांश गबन की शिकायतों को बेहद आसानी से दबा दिया जाता है।

आम तौर पर ग्रामीण इलाकों से आवाजें बुलंद होती रहती है की सरपंच,सचिव और जीआरएस ने मिलकर गबन किया है।हालाकी उनकी जानकारी के आधार पर यह तथ्य सही तो है लेकिन एक हद तक,दरअसल यह तिकड़ी खुद ही अफसरशाही के सुनहरे मायाजाल के चक्रव्यूह में उलझी हुई है!

जारी : 




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