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ये पांच साल भी गुजर गए! : रविवारीय विशेषांक।

शर्मिले , शांत प्रिय, कोमल ह्रदय वाले लोग जो आज की दुनिया की आंखों से अब भी ओझल हैं।

यह सच किसी के भी मन में हलचल मचा सकता है कि कुछ लोग आज भी मात्र भात झोल खाकर ज़िंदा रहते हैं।बहुत से लोगों को आज भी कई बार खाली पेट सोना पड़ता है, क्योंकि वो दिन में दो वक्त के भोजन की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। 

आज भी उस गांव तक सड़क,बिजली,पानी नहीं पहुंचा है!अस्पताल और स्कूल की तो फिर बात ही क्या कहें?सोलर लाइट किसी झुग्गी को रोशन कर रही है तो किसी झोपड़ी में अंधेरे का कब्जा है।रेडियो और टीवी की पहुच तक आज भी यहां नही है।

लोकतंत्र और नागरिक अधिकार जैसे शब्द यहां बौने नज़र आते हैं।मौजूदा समय में इनके हालात बहुत बदल गए हैं। इनकी जो स्थिति है, वो बहुत ज़्यादा दर्दनाक है।

आदिवासी समुदाय के लोगों को गर्मियों के दिनों में मटमैला गंदा पानी पीना पड़ता है,ये करें भी तो क्या इनके पास अपने दर्द बयां करने के सिवा कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं है। लोगो की औसत आयु पचास वर्ष से भी कम हैं, लेकिन क्षेत्रीय विधायक और जिला प्रशासन का इनके ओर ध्यान भी नहीं जाता।

झरने के पानी से प्यास बुझानी पड़ रही है, नल जल योजना सिर्फ शहर और शहरी गावों तक सिमटी है?आज भी हर घर में चूल्हे पर खाना पकता है,उज्ज्वला योजना की तो खबर तक उड़कर यहां नही आई!

गरीबी और भुखमरी की भीषण समस्याएँ व्याप्त हैं। भात और आलू झोल के भरोसे जिंदगी कट रही है।

घने जंगल और पहाड़ों के बीच बसे गांव में आदिवासी समुदाय के तकरीबन तीन सौ लोग रहते हैं। कुछ हिस्सों में बिजली के नाम पर विभाग की ओर से खम्भा तो गाड़ दिया गया ,लेकिन एक बार खराबी आने के बाद दोबारा इन खम्भों में तार खींचना भूल गया।

लोकतांत्रिक हिस्सा होने के बावजूद आदिवासी समाज जंगल में असंतुष्ट जीवनयापन करने को मजबूर है।किसी सरकार या सियासी दल के नेताओं ने आज तक उनकी बदतर हालत की ओर ध्यान ही नहीं दिया, जिसका नतीजा यह है कि आदिवासी किसी पशु की तरह जिंदगी गुजार रहे हैं।

कहते हैं कि,आदिवासियों के लिए साल का करोड़ो का बजट मिलता है पर मिलने वाली राशि जाती कहा ये बात पूछने वाला इस जिले में कोई नही है।

कई सरकारें आईं और चली गईं, मगर किसी ने जंगल में रहने वाले आदिवासियों की सुध नहीं ली।अशिक्षा का अंधकार इतना घना है कि,सरकार से मिलने वाली नागरिक सुविधाओं के बारे में आदिवासियों को कुछ भी जानकारी नहीं है।

गांव में बच्चे से लेकर बड़े और महिलाएं खुले में ही लोटा लेकर जाते हैं। यह ऐसा गांव है,जहां आज भी स्वच्छ भारत अभियान बेअसर है।संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों के द्वारा बरती जा रही उदासीनता के कारण लोगों को उक्त योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जिससे लोगों में आक्रोश बना हुआ है।

प्रशासन आदिवासियों को बुनियादी सुविधा देने से भी कन्नी काट रहा है, जिससे आदिवासियों की हालत खराब ही होती जा रही है।डिजिटल युग के इस दौर में लोग आज भी लालटेन और ढिबरी के सराये जिंदगी जीने को मजबूर हैं। ये लोग आज भी सरकार से आस लगाए बैठे हैं कि कभी तो इनके भी दिन बहुरेंगे और इनके इलाके का भी विकास होगा। 

कुकड़ी पानी, बड़ा गांव, तैलैया:मोहपानी:चिचली/गाडरवारा:नरसिंहपुर।

जारी :




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