*कुकडी पानी आंदोलन : कहानी छह दिनों की : नरसिंहपुर।*
जनपद पंचायत चीचली परिसर में दरी पर डेरा डाले हुए मात्र सोलह आंदोलकारी।
ना पास में कोई नाश्ते भोजन पेयजल की कोई व्यवस्था, ना ही ठंड के बचने के लिए पर्याप्त कपड़े और बिस्तर।
बस सभी की आंखों में एक आस की उन्हें अब पहाड़ पर मौत के साए तले नही जीना है।अब वे अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं,अपने परिवार के साथ खुशियों भरे लम्हे को जीना चाहते हैं।
हालाकी प्रशासन इन लोगों की वास्तविक स्थिति से परिचित था,इसलिए स्थानीय प्रशासन द्वारा आंदोलन कारियों के साथ सकारात्मक रवैया अपनाया जा रहा था।
जब कुकड़ी पानी के निवासियों की सच्चाई आम जनता तक पहुंची तो अनेक संगठन और समाजसेवी आंदोलन कारियो की मदद के लिए आगे आए।
रात में सिर्फ एक बार भर्ता और बाटी खाकर अपनी मांग पूरी होने की बाट जोह रहे सोलह लोग जैसे तैसे दिन गुजार रहे थे। कुकडी पानी आंदोलन की तस्वीरें जब मीडिया और सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों तक पहुँचीं तो सवाल उठा कि क्या वाकई आजादी के 76 वर्ष बाद भी यह आसिवासियो की असली तस्वीर है!
जिसने भी सच को देखा वह इस उदासीनता और उपेक्षा पर सर झुकाकर रह गया। कुकड़ी पानी आदिवासियों की तस्वीर वीडियो के वायरल होने के बाद भारिया समुदाय के प्रति सहानुभूति पैदा हुई।
कंडे न मिल पाने पर लकड़ियां जलाकर उन पर भर्ता बाटी बना कर जमीन पर बैठ कर पत्ते पर खाना खा रहे आन्दोलन कारियो की तस्वीर भी वायरल हुई थी।
आंदोलन के दौरान जनपद परिसर में प्रशासन और ग्रामीणों के बीच कई दौर की वार्ताएँ हुईं।इस दौरान stringer24news टीम कुकड़ी पानी के निवासियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी थी,और लोगों को आंदोलन के ताजा हालात से पल पल रूबरू करा रही थी। चार दिन बाद ही प्रशासन के अधिकारी आगे आए और ग्रामीणों की मांग जल्द पूरी करने का आश्वासन दिया।
जब कुकडी पानी आंदोलन के दौरान कुकड़ी पानी के भारिया आदिवासियों के समर्थन में बैठे विक्रम सिंह राजपूत को माइनर हार्ट अटैक की शिकायत के बाद ग्रामीणों ने आन्दोलन समाप्त करने का मन ने बना लिया था।धरने का पहला दिन गुजर गया था,अगले दिन तमाम सभाओं और बैठकों के बाद विक्रम सिंह राजपूत शाम से ही बैचेनी और सीने में दर्द से परेशान थे।
आंदोलन किसी भी स्थिति में कमजोर न पड़े इसलिए तब सिर्फ कुछ खास लोगों को इसकी जानकारी दी गई थी। रात होते होते अचानक तकलीफ बढ़ने लगी थी। उस पर भी मुसीबत यह थी जीवन रक्षक दवाएं नरसिंहपुर से लाने ही एक अंतिम विकल्प था,किंतु रात के ग्यारह बजे क्या किया जाए,सब इसी सोच विचार में डूबे हुए थे।
हालाकी इस बीच समय रहते चिकित्सक से संपर्क साधा गया और अप्रत्याशित रूप से रात तकरीबन एक बजे नरसिंहपुर से दवाएं चिचली पहुंचा दी गई।
जारी :
