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*कुकड़ी पानी : ग्राम पंचायत मोहपानी:जनपद चिचली : नरसिंहपुर।*

यदि आपको विकास देखना है तो मध्य प्रदेश के।  नरसिंहपुर जिले की ग्राम पंचायत मोहपानी जनपद चिचली के अंतर्गत आने वाले है गांव कुकड़ी पानी में आकर देखिए।भरिया समुदाय के इन लोगों तक आज भी बिजली,पानी सड़क जैसी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई है। बच्चे कुपोषित और अशिक्षित है।

गोटीटोरिया से दो पहाड़ों को क्रॉस कर और लगभग बारह किलोमीटर चलकर कुकड़ी पानी पहुंचना होता है।पहाड़ी रास्ते इतने खराब हैं की जरा चुके और कभी भी कोई भी हादसा हो सकता है।पैदल चलना ही यहां दुश्वार है।कहीं कहीं तो रास्तों के दोनो तरफ खाई है और कुछ स्थान पर तो इतने संकरे रास्ते है कि आपको जान जोखिम में डालकर कुकड़ी पानी जाना पड़ता है।स्थानीय लोगों के लिए यह जिंदगी किसी नरक की आग में जलने से कम नहीं है।

कोई नेता,जनप्रतिनिधि,सरकारी बाबू,अधिकार यहां तक नहीं आते हैं।

आप इस पहाड़ को जिले का सबसे ऊंचा पहाड़ और मोहपानी को जिले का चेरापूंजी कह सकते हैं। सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के इसी पहाड़ पर उमर जैसी अन्य बरसती नदियों का जन्म स्थल है।गांव वालों ने बताया की पिछले तीस सालों से यहां कोई पत्रकार नही आया।कुकड़ी पानी की स्थिति से लोगों को रूबरू करवाने stringer24news की टीम जब यहां पहुंची तो स्थानीय लोगों ने कहा कि,उनकी पूरी उम्र में वे किसी पत्रकार को पहली बार अपने गांव में देख रहे हैं। अपनी जान जोखिम में डालकर आदिवासियों की स्थिति से लोगों को रूबरू करवाने के लिए इस दुर्गम स्थान पर पहुंचाना stringer24news टीम के लिए एक कीर्तिमान है।

आप इसे नरक का द्वार भी कह सकते हैं क्यों कि यह जीवन जीता नही बल्कि सिसकता है।द्रुर्गम पहाड़ों में बसे कुकड़ी पानी में भारया आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं।खेती से इनका गुजर बसर होता है। भारया आदिवासी अनाज को बेचते नही है।उनका कहना है कि यदि हम बेच देंगे तो यहां पहाड़ों पर खायेंगे क्या?

गांव में आय के दूसरे साधन की आप कल्पना नहीं कर सकते हैं।जिंदगी यहां दुश्वार है।

आज भी यहां न बिजली है,ना पानी है,ना सड़क है और न कोई नाली है,ना कोई अस्पताल है।सरकार ने स्कूल तो खुलवा दिया है लेकिन इन पहाड़ों पर चढ़कर शिक्षक आते होंगे,ऐसी उम्मीद भी आप नही कर सकते।आठ दस दस में एक बार शिक्षक आते हैं और अगले दिन रूककर अपनी थकान उतारते हैं और इसके बाद फिर वापसी का सफर।इस बीच पढ़ाई कहीं नहीं है। सातवी कक्षा के बच्चे अपना नाम तक नहीं लिख पाते हैं।

गांव में ना मोबाइल नेटवर्क है और न कोई टीवी।बच्चों के मनोरंजन का यहां कोई साधन नहीं है।

भारया समुदाय की महिलाओं की जिंदगी भी बड़ी मुसीबतों से घिरी हुई दिखाई देती है।अभावों और आशाओं के बीच जीने की जद्दो जहद में एक महिला का स्वाभाविक जीवन समाप्त हो गया है।किसी भी महिला ने यहां अभी तक टॉकीज या मल्टीप्लेक्स नही देखा है।शहर के जीवन से पूरी तरह अनजान हैं ये महिलाएं।

जहां जीवन ही इतना दुष्कर हो वहां आप विकास या जीवन में खुशियों के बारे में विचार नहीं कर सकते हैं।

गरीबी क्या होती है?अभाव क्या है?शौक मर जाना किसे कहते हैं? घुट घुट कर जीना क्या है?यह दर्द कुकड़ी पानी के निवासी ही जानते हैं।आप इसे कभी महसूस नहीं कर पाएंगे।तब तक तो नही जब तक आप यहां आकर उनके हालात न देख लें और यहां तक पहुंचना इतना आसान नहीं है।

भरिया समुदाय के लोगों की दैनिक भोजन शैली की यदी बात करें तो, दोपहर का भोजन हो या शाम का नाश्ता और फिर रात का खाना आलू की सब्जी चावल मुख्य भोजन है,गेहूं की रोटी या पूड़ी खाने से अक्सर बचते हैं।चाय के साथ बिस्किट या टोस्ट बच्चों के लिए सामान्य नाश्ता है।

समुदाय आज भी विश्वास, संस्कृति और परंपरा को लेकर सचेत है,शायद यही वजह है कि आज भी यहां घरों में दरवाजे नहीं होते।भोलापन अब भी बरकरार है चोरी,व्यभिचार जैसी बातों भरिया से समुदाय अब भी बचा हुआ है।

कोई बीमार पड़ जाए तो कपड़े की झोली बनाकर उसे दो पहाड़ क्रॉस कर सड़क तक पहुंचना होता है।गांव में वृद्ध आदमी या महिला आपको दिखाई नहीं देंगे क्यों की यहां औसत आयु ही पचास पचपन वर्ष है। यहां बीमार होने का मतलब सिर्फ मौत है।

जारी :

अगले अंक में आप विडियो में देख सकते हैं कि भरिया समुदाय का जीवन, , , 

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