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देश प्रदेश।

*पत्रकारिता का नया पतन!* : *पत्रकारिता के पेशे का नया चलन?*

हाल फिलहाल ही कुछ पत्रकारों पर वसूली के गंभीर आरोप लगे और मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।आरोपों में कितनी सत्यता है?यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन इन दोनो घटनाओं ने अनेकों सवालों को भी जन्म दिया है, जिन पर मंथन जरूरी है अन्यथा स्वस्थ लोकतंत्र सिर्फ किताबी शब्द बनकर रह जायेगा।

दरअसल आज की हमारी वार्ता का विषय है,  *पत्रकारिता का नया पतन!* : *पत्रकारिता के पेशे का नया चलन?*

पाठकों दर्शको को यह तय करना चाहिए कि जो उन्हें दिखाया जा रहा है वह खबर है भी या नहीं।दरअसल आज प्रचार,विज्ञप्ति,विज्ञापन को ही खबरों की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा है। खबर वही है जिसे दबाया जाए, बाकी सब तो विज्ञापन है, हालाकी यह सच है, कि पत्रकारिता में विज्ञापन आय का मुख्य साधन है, लेकिन आज विज्ञापन और वसूली के बीच मोजूद महीन अंतर दरकने लगा है।

एक पत्रकार जनता के लिए सिर्फ सन्देश वाहक है लेकिन आज इसके विपरित आचरण दिखाई देता है,कुछ लोगों ने तो बकायदा व्हाट्सएप इत्यादि पर अपने नाम के आगे पत्रकार जी बस बात खत्म जैसी टैग लाइन लिख रखी है।क्या हम पत्रकारिता की संहिता को भूल रहे हैं?

यह सच है कि,अधिकांशतः स्थानीय पत्रकारों और एजेंसी संचालकों व एमएसएमई इकाइयों को कोई वेतनमान नही मिलता है।विज्ञापन पर मिलने वाला कमीशन ही आय का एक साधन है।

ऐसी स्थिति में डोनेशन एक अन्य विकल्प होता है। stringer24news के संचालन में डोनेशन का खासा सहयोग है। शहरी नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों से भी stringer24news को डोनेशन प्राप्त हुआ।आज 27 lac, viewers पाठकों/दर्शको की विश्वसनीयता ने stringer24news को जिले के डिजिटल मीडिया वर्ल्ड में उच्चतम पायदान पर पहुंचाया है। आज हमने पारंपरिक पत्रकारिता के नियमों एवं नैतिकता का पालन करते हुए एक नया पाठक वर्ग या दर्शक वर्ग बनाने में सफलता हासिल की है।भ्रष्टाचारियों के सामने झुकने की अपेक्षा हमने डोनेशन को प्राथमिकता दी।यही वजह है कि हम आज भी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ भ्रष्टाचार पर प्रहार करते हुए लागतार न्यूज अपडेट जारी कर रहे हैं।

जब लोग यह मानते हैं कि कोई खबर पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण पूर्वाग्रहों से प्रेरित होते हैं, तो ऐसे में खबर  की विश्वसनीयता कम हो जाती है। ऐसे में यह जिम्मेदारी आम जनता के कांधो पर आ जाती है खबरों की हकीकत की पहचान करना। जो बिलकुल भी आसान नहीं है।

आज कीचड़ उछाल प्रवृत्ति ने पत्रकारिता को 'टूल' के रूप में भी उपयोग किया है।मैं अब तक ऐसे कितने ही लोगो से मिला हूं,जिसने बात करते दौरान ही तपाक से अपना प्रेस कार्ड निकाल कर दिखा दिया। मैं हैरान हूं यह देखकर की ,यह सब आखिर चल क्या रहा है? लोगों ने पत्रकारिता को पार्ट टाइम पेशे की तरह मान लिया है?बौद्धिक स्तर,शैक्षणिक योग्यता,उचित वैचारिक निर्णय लेने की मानसिक क्षमता का क्या कोई औचित्य नहीं है?क्या एक पत्रकार में इन गुणों का होना आवश्यक नही है?क्या किसी खबर को सिर्फ कॉपी, पेस्ट,फॉरवर्ड करने और किसी संस्थान की एजेंसी मात्र लेने या फिर किसी डिजिटल मीडिया से जुड़ जाने से ही पत्रकारिता आ जाती है?

एक पत्रकार/लेखक समाज को दिशा प्रदान करता है लेकिन वसूली कर्ताओं की घिनौनी हरकत के कारण ईमानदारी से अपना जीवन पत्रकारिता को समर्पित करने वाला पत्रकार/लेखक का एक बड़ा वर्ग भी संदेह के दायरे में आ जाता है।

कॉपी, पेस्ट,फॉरवर्ड करके या फिर तोड़ मरोड़कर विज्ञप्ति, खबरों और घटनाओं को प्रस्तुत करने वाली पत्रकारिता के जरिए पैसे तो कमाए जा सकते हैं, लेकिन ऐसी कलम समाज को कोई दिशा प्रदान नही करती है।

एक पत्रकार की भाषा संयमित होनी चाहिए लेकिन मैंने व्हाट्सएप ग्रुप पर अक्सर देखा है कि भाषा की मर्यादा को दरकिनार कर दिया गया है। ना सिर्फ अपशब्दों का उपयोग करते हैं बल्कि द्विअर्थी संवादों के जरिए मर्यादा की सीमा को भी पार कर जाते हैं।

पत्रकारिता के इस नए पतन के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?क्या समाज और प्रशासन की कोई भी जवाबदेही नही है?

पत्रकारिता देश का चौथा मजबूत स्तंभ माना जाता है।लेकिन,पत्रकारिता के परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है।

अब इस सच्चाई को अनदेखा नहीं किया जा सकता हैं कि पत्रकारिता अन्तत: एक व्यवसाय है। किसी अन्य व्यवसाय की भांति इसमें भी अनेक स्तरों पर तालमेल तथा समझौता करने की आवश्यकता होती है। 

हालाकी इसका आशय यह कदापि नहीं हो सकता कि, एक पत्रकार अपने पेशे की नैतिकता को खो दे।

 जारी : 

विज्ञापन और वसूली के बीच अंतर, , 

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