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औरत की आंखों में ना का अनुरोध : स्त्री आख़िर चाहती क्या है?
चालीस की उम्र की दहलीज पर आते आते एक औरत का जीवन बस घर की चार दिवारी में सिमटकर रह जाता है। जहां ना कोई उसकी आशाएं हैं और ना ही कोई इच्छा।सुबह की चाय से शुरू हुआ दिन का सिलसिला रात के खाने की बर्तन की सफाई पर खत्म हो जाता है।
पति थकान और तनाव दूर करने की मशीन समझ लेता है, और बच्चे तो फिर भी बच्चे ही हैं।दोस्ती और प्यार तो एक औरत के जीवन से कब का जुदा हो जाता है बाकी रह जाती हैं तो सिर्फ जिम्मेदारियां।
आखिर कब तक और क्यों औरत को सिर्फ एक मशीन या उपभोग की वस्तु के नजरिए से देखा जाता रहेगा?आखिर उसका भी अपना स्वतंत्र जीवन है, लेकिन पुरुषवादी मानसिकता ग्रस्त समाज में एक महिला का स्थान आज भी अपने वास्तविक स्तर पर नही है।
कभी किसी को डायन बताकर मार दिया, तो कभी किसी को अपनी हवस की आग मिटाने के लिए सूली पर चढ़ा दिया और कभी किसी को दहेज की आग में झोंक दिया।अनदेखी और उपेक्षा का नर्क उसका मुकद्दर बना दिया गया?आज भी औरत इस नर्क को महसूस करती है,उसमें जीती है और मरती है।
हमने विभिन्न महिला समूहों से बातचीत के आधार पर इस डेटा को तैयार किया है।महिलाओं की स्थिति में स्वतंत्रता के 76 सालों के बाद क्या और कितना बदलाव आया है? शहरी और ग्रामीण महिलाओं के जीवन स्तर में कितनी असमानता है?क्या शोषण,सुरक्षा और उत्पीड़न का दंश महिलाओं के हिस्से में आज भी आ रहा है?
देखिए आज भी समाज में महिलाएं खुलकर सेक्स लाइफ और अपने व्यक्तिगत जीवन जीने के बारे में चर्चा नही कर सकती है।आज भी एक पुरुष चालीस साल की उम्र में लिव इन रिलेशनशिप,गर्ल फ्रेंड या दूसरी शादी के बारे में सोच सकता है,बात कर सकता है! लेकिन एक औरत को समाज ने आज भी यह अधिकार नहीं दिया है?
आप कहते हैं महिला सशक्तिकरण की बात तो एक बार आपको उन घरों में भी देखना चाहिए जहां महिलाएं वर्किंग वुमन के तौर पर अच्छा खासा जॉब कर रही है लेकिन उनकी तनख्वाह पर अधिकार पति का ही होता है कुछ परिवारों में तो कमाने के बाद भी औरत उन पैसों को अपनी मर्जी से खर्च तक नहीं कर सकती है।
संस्कार,सभ्यता, रीति रिवाज,धर्म,,मर्यादा की सुनहरी जंजीरें आज भी सिर्फ महिलाओं के पैरों में दिखती हैं! एक पुरुष इन सभी बातों के परे है?जिम्मेदारियों का ठीकरा हमेशा एक औरत के सर पर ही क्यों?क्या संविधान ने पुरुष और औरत की आजादी में कोई भेद किया है?
औरत को हमेशा उपभोग की किसी वस्तु की तरह ही देखा गया है।आज टीवी चैनल पर मोजूद विज्ञापनों को देखकर आप समझ सकते हैं कि कैसे एक औरत को उपभोग की वस्तु की तरह परोसा जा रहा है।
इन तमाम तकलीफों के साथ ही औरत के जीवन में झंझावात बनकर आती है परिवारिक बेदना। सरल शब्दों में कहें तो अपने ही परिवार में जब औरत उपेक्षित छोड़ दी जाती है, उस पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा जाता,तब औरत जिस तकलीफ से गुजरती है उसका अनुमान लगाना सहज नहीं है।
42 वर्षीय ग्रहणी विनीता (परिवर्तित नाम) बताती है कि,मेरी शादी लगभग 22 की उम्र में हो गई थी,तब शुरुआती कुछ साल तो अच्छे गुजरे लेकिन इसके बाद परिवार में बदलाव आने लगे।पति अक्सर पार्टी और थकान के नाम पर शराब पीने लगे। उनके अपने ही ऑफिस की किसी महिला से भी रिलेशन है। बच्चे बड़े होने लगे तो धीरे धीरे ऐसा लगने लगा जैसे मुझे उपेक्षित छोड़ दिया है,किसी को मेरी फिक्र नहीं है,,हां लेकिन जरूरत सबको है।विनिता कहती हैं कि एक शादीशुदा औरत जिंदा लाश की तरह होती है। इसे समझना इतना आसान नहीं है।आप उपेक्षा के नरक में कैसे सांस ले सकते हैं?
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