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मेरी कलम का कद कुछ और बड़ा कर दो,

आज प्रशासन को कटघरे मे खड़ा कर दो।।

रविवारीय विशेषांक: मेरी कलम से।

जनता की भीड़ जब भेड़ में तब्दील की जाती हुई महसूस की जाने लगे तब उसे लोकतंत्र कहना गलत होगा। हां यह राजतंत्र की निशानी अवश्य कही जा सकती है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने वाला प्रशासनिक तंत्र तब राजतंत्र के हाथों में बंधी डोर के इशारे पर नाचने लगे तब ऐसे न्याय तंत्र को बिना कोई देर किए कटघरे में खड़ा कर दिया जाना चाहिए।सवाल पूछना चाहिए।

कटघरे में खड़े प्रशासन से जवाब की उम्मीद तो की ही जा सकती है! लेकिन सवाल करने की हिम्मत करे कौन?

अब कलेक्टर से कौन पूछे की विकास के आंकड़ों का जमीनी हकीकत से मिलान करते भी हो या नही? कौन पूछे एसपी से की शहर के अंदर पलने वाला अपराध और नशे के अवैध कारोबार पर अंकुश लगाने में पुलिस प्रशासन क्यों सुस्त दिखाई देता है?कौन पूछे नेताओं से की क्या हम वाकई लोकतंत्र में हैं?कौन पूछे अधिकारियों से की क्यों गबन की जांच में ढिलाई है,तुम्हारे हिस्से में कितनी काली कमाई आई है? कौन पूछे पार्षदों से की लाखों खर्च के बाद आज उनके गली मोहल्लों में स्वच्छता के क्या हाल है? कौन पूछे राजशाही के इन ठेकेदारों से की एक नागरिक को बुनियादी सुविधाएं देने और उसके मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में शासन प्रशासन कितना संजीदा है?

कौन पूछे मसिहाओं से की, भू माफिया जमीनों को खा रहा है , रेत माफिया नदियों को मार रहा है,यह सिलसिला कब रुकेगा?

भूख ,गरीबी,बेरोजगारी,मंहगाई,बीमारी से जूझता हुआ इंसान "सवाल करने" से कतराता है।यदि वह सवाल उठाता भी है तो तंत्र की कार्यशैली के चलते थककर बैठ जाता है। 

तन्त्र के काम करने की यह शैली की "सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे" न्याय व्यवस्था के लिए घातक है?

आम आदमी को कागजी कार्रवाई,दिखावे की जांच के मायाजाल में फसाकर यह साबित करने की कोशिश करना की न्याय मिल रहा है बिल्कुल झूठ है!अधिकारी आम जनता के बीच से उठती हुई शिकायतों को इस कदर उलझाऊ बना देते हैं की तंत्र में बैठे प्रशासन के कारिंदे भी सच और झूठ के बीच फैसला करने में असमर्थ नजर आने लगते है!

आजादी का अमृत महोत्सव मनाने वाले समझते हैं कि माँगने से न्याय मिल जाता है?अरे आजकल तो भ्रष्टाचार का मतलब ही देश सेवा हो गया है और सवाल पूंछने का मतलब देश-द्रोह या देश पर खतरा! अब भ्रष्टाचारी से ही न्याय मांगने पहुंच जाओगे तो फिर बज गई बैंड!

 वैसे भी अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा की तर्ज़ पर चलने वाले सिस्टम्म से आप और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं।

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