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 *अमावस की रात: पातालकोट: सत्य घटना पर आधारित।* 


वैसे मैं अपनी बात करूं तो मुझे पहाड़ों से कुछ ज्यादा ही लगाव है। अभी हाल ही में पिछले सप्ताह पातालकोट दोबारा जाने का मौका मिला तो मना नहीं कर पाया।

दरअसल हमारे टीम मेंबर विपिन और उसके कुछ दोस्तों का पातालकोट जाने का प्लान था लेकिन अचानक कुछ कारणों से विपिन के अलावा बाकी के दोस्त नहीं जा पा रहे थे।

विपिन ने जब मुझे कॉल करके अपने प्लान के बारे में बताया तो मैं तैयार हो गया ,साथ ही हमारी न्यू टीम मेंबर रागिनी भी पातालकोट के दो दिन के कैंप टूर पर चलने के लिए तैयार हो गई थी।

रात में लगभग सभी तैयारियां कर ली थी। दो दिन का टूर था लिहाजा टार्च,लाइटर,कुछ पैन किलर और जरूरी दवाएं, वाटर केन, स्लीपिंग बैग,नूडल्स, बिस्किट और स्नैक्स भी साथ में रख लिए थे क्यों की अगले दो दिन जंगल में पहाड़ों के साथ गुजरने थे।

अगले दिन सुबह होते ही हम तीनो बाइक से पातालकोट के लिए निकल पड़े थे।हर्रई, धनोरा कारेआम होते हुए हम दोपहर तक पातालकोट पहुंच गए थे।

तकरीबन तीन किलोमीटर की चढ़ाई ने हमारे शरीर की कठिन परीक्षा ली।पहाड़ पर चढ़ाई के दौरान कई बार बड़ी चट्‌टानों वाला ऐसा हिस्सा आया जहां गिरते तो बचते नहीं।यहां ऊंचाई से फिसलकर गिरने का डर था।हम कुछ दूर चढ़ते फिर थक जाते। फिर आराम करते और फिर आगे बढ़ते। इस दौरान चढ़ाई के रास्ते में अनेक तरह की आवाज़ें, जीव-जंतु, सुंदर प्राकृतिक छटा मन को मोहित कर रही थी।

हम तीनों अब पहाड़ की उचाई पर थे। दूर-दूर तक घना जंगल और नीचे देखने पर खेत के छोटे- छोटे भाग। पूरा का पूरा दृश्य रोमांचकारी था। 

जंगल पहाड़ छानते छानते दोपहर एक बजे से शाम के चार कब बज गए इसका पता ही नही चला।राजा खोह से कुछ दूरी पर ही नदी के किनारे चलकर समीप के एक गांव तक पहुंचा जा सकता था।हम तीनो ने अपना कैंप रात को वहीं लगाना तय किया।नदी के ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चलते चलते हम शाम साढ़े छह बजे उस छोटी से बस्ती में पहुंच गए थे।

तकरीबन बीस पच्चीस झोपड़ियों की उस बस्ती को देखकर ऐसा लगा जैसे हम किसी और युग में आ गए हैं।अधिकतर दरवाजों के बाहर लालटेन और चिमनियां टिमटिमा रही थी।कुछ घरों के दालान में जल रहे चूल्हे पर सिकती हुई रोटी की सौंधी महक भूख के आगे कुछ सोचने नही दे रही थी। हमारी बात गांव के ही एक व्यक्ति सरवन से हुईं, उन्होंने अपने घर के दालान पर रुकने की अनुमति दी और रात के खाने के लिए आमंत्रित भी किया।

अब तक रात के आठ बज चुके थे। हम तीनो अपना कैंप सेटअप करके खाना खाने पहुंच गए थे। रात के खाने में आलू बैंगन के साथ चटनी थी।खाना वाकई बहुत स्वादिष्ट था।अब तक सरवन जी के घर पर आसपास के लोग भी इकट्ठे हो गए थे।देर रात तक बातों का दौर जारी रहा।हम लोग काफी थक चुके थे और अब तक रात के ग्यारह बजने आ गए थे, इसलिए अपने कैंप में सोने चले गए थे।बाहर अलाव में आग जल रही थी।

      हालाकी सरवन जी ने पहले ही बता दिया था कि पहाड़ के लिए आप सब अंजान हैं, रात में इधर-उधर न जाना, साथ में रहना। जंगल है, जंगली साँप-बिछु के अलावे बहुत से जानवर हैं, इसलिए एक समूह में रहना आपके लिए अच्छा रहेगा। 

            लेकिन जंगल का गहरा सन्नाटा और बीच बीच में रह रह कर पहाड़ों से उठती जानवरों की आवाजें सोने नहीं दे रही थी। मैं कैंप से बाहर निकला।काली अंधेरी अमावस की रात थी। बड़े-बड़े पेड़ और पशु पक्षियों की आवाजें पूरे जंगल में गूंज रही थी।रात के वक्त नदी की घरघराहट को सुनना एक अलग सा अहसास दिलाता है। उतार- चढ़ाव, समतल, पहाड़ी, झरने, नदियाँ, जंगल सबकुछ देखा इस यात्रा के दौरान। भूख-प्यास, थकान से इस तरह सामना होगा, मौत को इतने करीब से देख पाउँगा, ये जरा भी नहीं सोचा था।

जारी 

दरअसल हुआ यूं कि जब मैं एक पहाड़ी झरने को पार कर रहा था तभी

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