विगत दिनों की खबरों पर नजर डालें तो पाते हैं,जिले की अनेक ग्राम पंचायतों में शक्तिशाली, रसूखदार और बड़े लोगों ने शासकीय राशि को पलीता लगाते हुए ग्रामीणों के हिस्से शासकीय योजनाओं के माध्यम से आने वाली सरकारी मदद पर अनेक तरह की तिकड़म लगाते हुए कब्ज़ा कर लिया है।"विस्तृत विश्लेषण के बाद जो नतीजे सामने आए उनके आधार पर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है।"
आलम यह है की ऐसी ग्राम पंचायतों में ग्राम प्रधान सिर्फ मूक दर्शक बनकर रह गए हैं।
विकास के लिए आने वाली राशि प्रधान पद पर बड़े और रसूखदार लोगों के मन में लालच पैदा कर देती है!ग्रामीणों और गांव के विकास के लिए आने वाली इस राशि को हड़पने की लालसा में गबन और धांधली के बड़े खेल खेले गए?
जनता के धन पर बुरी नज़र रखने वालों ने आखिर कितना विकास किया होगा यह प्रश्न विचारणीय है।
ग्रामीण अक्सर शिकायतों के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश करते रहे ,किंतु शिकायत अधिकारियों को करने के बाद भी कई बार अधिकारियों द्वारा जाच नही करना, जाच को लंबित रखना, सरपंच सचिव एवं अन्य भ्रष्टाचार मैं लिप्त लोगो पर कार्यवाही नही करना/या कार्यवाही करने से बचना, क्या इससे यह स्पष्ट नहीं होता है कि, सरपंच और सचिव से साठ गाठ कर उनको बचाने का प्रयास किया जाता है?
कुम्हड़ी,पलेरा जैसे गांव की फेहरिस्त लंबी है,जहां निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए गरीब ग्रामीणों के साथ छल किया गया।
आंकड़े बताते हैं की,कुछ क्षेत्रों में स्थिति इतनी बदतर है कि, विकास में लगने वाले पैसों का बंदरबांट कर लिया जाता है और, जो कार्य ग्राम पंचायत में होना था वह सिर्फ कागजी कार्यवाही में सिमट कर रह जाता है,कई बार तो जमीनी स्तर पर कुछ काम ही नहीं हुआ और राशी डकार ली गई !, ,