ग्राम बेदू।
शासन और प्रशासन की नीतियों और खामियों के अलावा गांव में और भी बहुत कुछ है ,जिसकी चर्चा होना आवश्यक है।जिले में अनेकों ग्रामों के भ्रमण के दौरान अनेक मुद्दों पर चर्चा और सवाल के साथ ग्रामीण परिवेश को नजदीक से देखने का मौका भी मिला।
आज की चर्चा का विषय गांव की कुदरती सुंदरता और ग्रामीण संस्कृति और परिवेश पर आधारित है।
सड़क के दोनो तरफ खड़े छाया दार वृक्ष,लहलहाती फसलें,बैलगाड़ी पर अनाज ले जाता किसान,खेत में काम करती हुई महिलाएं,पतंगबाजी और गिल्ली डंडा जैसे खेल में मशगूल बच्चे,चौपाल और चाय की दुकानों पर युवाओं की चहल पहल के दृश्य देखकर मंत्रमुग्ध हो जाना सहज है।हालाकी अब फसल कटाई का समय है,आम पर मौर आ गया है,केरी के छोटे फल देखकर उन्हें तोड़ने के लिए जी ललचाना बचपन को स्मृतियों को ताजा कर देता है।
सहजता ग्रामीणों का स्वभाव है।ग्रामीणों का भोलापन और अपनी जड़ों से गहरा जुड़ाव आमतौर पर शहर में दिखाई नहीं देता है।
आधुनिक सुविधाओं से लैस होने के बाद भी गांव अपनी मूल जड़ों में बंधा हुआ है।वाईफाई, अमेजन,स्मार्ट फोन,लेटेस्ट गैजेट एवम समसामयिक विषयों से युवा अनजान नहीं है।
आज भी गांव में स्वागत और सेवा सत्कार का अंदाज देखकर जमीन से जुड़े होने का अहसास दिल को सुकून से भर देता है।
बेल का शरबत,ताजा पुदीना की चटनी,आम का पना,छाछ का जो मजा गांव में है वह शहर में नही।
कुर्सी,टेबल और खड़े खड़े भोजन की परिपाटी से परे पीढ़े पर भोजन करना अज्ञानता नही बल्कि अन्न और अन्न दाता का सम्मान है।
घरों में फ्रीज की मौजूदगी के बावजूद मटकों और सुराही का अपना विशेष महत्व है।
बेल,शहतूत,शहद,केंथा,चिरोंजी की उपलब्धता भोजन के स्वाद के साथ स्वास्थ्य को भी बड़ा देती है।
छुई और गेरू से रंगे मुख्य द्वार गर्व से अपनी संस्कृति की गाथा को बयां करते हैं।गाय और कुत्ते के लिए रोटी अलग रखने की चिंता में मानवीयता की झलक गांव की ग्रहणियो के ममत्व को भी प्रकट करती है।
वैवाहिक और मांगलिक उत्सव के दौरान स्थानीय संगीत पर गांव की अल्हड़ बालाओ का नृत्य उत्साह,उल्लास और आकर्षण से भरपूर होता है जो बरबस ही कदमों को थिरकने पर मजबूर कर देता है।
भागदौड़ से दूर कभी सुकून के कुछ पल बिताना है तो गांव से अच्छा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।
सुबह उठते ही गौशाला जाकर दूध लाना,साथ में बैठकर चाय और नाश्ते के बाद खेत खलिहान के लिए निकल जाना,लकड़ियां काटने और उपले थापने से लेकर तमाम दिनभर के काम आपसी पारिवारिक सामंजस्य और सहमति के आधार पर महिलाओं और पुरुषों द्वारा मिलजुलकर किए जाते हैं।गांव के बुजुर्ग और बच्चे भी अपना योगदान देने में पीछे नहीं रहते।
