अक्सर लोग भूल जाते हैं की दिया तले ही अंधेरा होता है।यह कोई अतिशयोक्ति नहीं की पत्रकारिता का कार्य जिसे लाइम लाइट से जोड़कर देखा जाता है,इसके दूसरे पहलू से अब भी लोग अनजान है।
चमक दमक के पीछे का अंधेरा अक्सर दिखाई नहीं देता है।
एक पत्रकार के लिए सुबह से कब रात हुई और कब फिर सुबह, खबरों की दौड़ भाग में यह पता ही नहीं चलता है !
राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव के बीच कार्य करना अति दुष्कर होता है।
रसूखदार लोगों या वरिष्ठ साथियों द्वारा पत्रकार के विकास पर रोड़े अकटकाने का सिलसिला भी थमता हुआ दिखाई नहीं देता है!
सच तो यह है कि नकारात्मक ताकतें पहले से ज्यादा चालाकी और धूर्तता से शातिराना अंदाज में पत्रकार को रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं!
आज भी हालात यह हैं कि पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग रोटी-कपड़ा-मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए जद्दोजहद करता हुआ दिखाई देता है !
वहीं दूसरी ओर पत्रकारिता के कार्य के दौरान ना जाने कितने ही दुश्मन बन जाते है!
कड़वा सच तो यह है कि लोग अक्सर पत्रकार का एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं,वहीं काम करवाने के बाद दूध में से मक्खी की तरह किनारे कर देने से भी कोई गुरेज नहीं किया जाता है।
हालाकी अपवाद हर काल खंड में मौजूद होते हैं,ऐसे ही पत्रकारिता के पेशे को कलंकित करने वाले कुछ अपवाद हर शहर और हर दौर में मौजूद रहते है।
आज ऐसे भी कुछ अपवाद हैं जिन्होंने अपना स्थान अपनी प्रतिभा से नहीं बनाया है हालाकी इसके लिए वे राजनैतिक और कूटनीतिक ह्थकंडों का भी बखूबी इस्तेमाल करते है।
ये अपवाद दूसरों के साक्षात्कार तो लेते हैं, लेकिन कभी अपना खुद का साक्षात्कार शायद ही लिया हो।
सच कहना लिखना जोखिम भरा काम है।हालाकी कुछ अपवादों ने इसके लिए भी एक शॉर्ट कट रास्ता ढूंढ लिया है, "कॉपी पेस्ट" का।
खबरों की हत्या के खेल में कब एक पत्रकार मर जाता है यह पता ही नहीं चलता।
भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का प्रमुख स्थान है।
लेकिन फिर भी आपको यह समझना होगा की पत्रकार का जीवन आसान नहीं है।भ्रष्टाचार,अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले खबरों की हत्या करने वालों की वजह से उपेक्षित और अनदेखे किए जा रहे हैं।
अपने अनुभव के आधार पर यह अवश्य कहना चाहूंगा की पत्रकार का जीवन सुरक्षित नहीं है, खतरों से खेल कर खबर लाते हैं, स्टिंग आपरेशन करते हैं ,सिर्फ सच को जिंदा रखने के लिए।आम जनता तक हर खबर निष्पक्षता से पहुंचाने के लिए अपना न जाने कितना कुछ दांव पर लगा जाते हैं।
मुझे आज भी याद है जब मैंने अपने मां बाबू जी से कहा था कि मैं मीडिया में जाना चाहता हूं, लेकिन माता पिता नें जाने नहीं दिया,बड़े प्यार से समझात हुए कहा की अनिश्चित भविष्य है।
लेकिन सिर्फ इस वजह से कलम से मुख मोड़ लेना आसान नहीं था।