इकरा स्कूल मे शायर अल्लामा इकबाल की शख्सियत पर एक रोज़ा कौमी उर्दू सेमीनार का आयोजन।
रांकई न्यूज़ (शाह फैसल) – ग्राम रांकई मे इकरा तालीमी इदारा के जेरे इंतजाम और राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद नई दिल्ली के जेरे एहतिमाम दिनांक 13 मार्च 2022 इतवार को सुफ्फा कॉम्प्लेक्स इकरा स्कूल प्रांगण मे एक रोज़ा कौमी उर्दू सेमिनार बउनवान “अल्लामा इकबाल की हयात व खिदमात असरे हाजिर के तनाजुर मे” आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम अपने निर्धारित समय सुबह 8:30 बजे से शुरू होकर दोपहर 1: 00 बजे समाप्त हुआ। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर सिद्दीकी मोहम्मद महमूद साहब जोकि वर्तमान मे डीन स्कूल ऑफ एजूकेशन एंड ट्रेनिंग (मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी हैदराबाद) हैं, के अलावा दीगर माहरीने उर्दू जुबान ने भी अल्लामा इकबाल साहब की हयातो फिक्र और उनकी खिदमात पर अपने अपने खयालात का बखूबी इजहार किया।
*किसने क्या कहा?*
1- जबलपुर से आए जनाब जमील अहमद साहब ने जहां अल्लामा इकबाल साहब के विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखते हुए अल्लामा इकबाल साहब के इस शेर पर अपनी बात मरकूज की कि “खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूंछे बता तेरी रज़ा क्या है। “ उनके कहने का मतलब यह था कि अपनी कोशिशें लगातार जारी रखना चाहिए एक न एक दिन कामयाबी ज़रूर मिलती है।
2- तो वहीं सिवनी से आए सैयद अहमद अली साहब ने “इकबाल और फलसफा ए तालीम” के जैली उनवान पर अल्लामा के इश्क़ के पहलू को उजागर किया। उन्होने अल्लामा का ये शेर “दायरे इश्क़ मे अपना मुकाम पैदा कर ...” , “जब इश्क़ सिखाता है, आदाबे खुद आगाही, खुलते हैं गुलामों पर अशरारे शहंशाही…” आदि शेर के जरिये उन्होने ये बताने कि कोशिश की कि किसी भी मक़सद के हुसूल मे उसके प्रति मुखलिसाना इश्क़ व मोहब्बत होना ज़रूरी है। और इसी की बुनियाद पर वो अपना एक मुकाम पैदा कर सकता है। उन्होने अल्लामा इकबाल के हवाले से कहा कि वे मगरिबी तालीम के मुखालिफ थे क्यूंकी वहाँ की तालीम अखलाकी इकदार के बजाए माद्दा परस्ती पर ज्यादा मब्नी है। उन्होने कहा सियासत और दीन एक दूसरे से जुदा नहीं हैं। इस ताल्लुक से उन्होने अल्लामा इकबाल का ये शेर कहा कि “सबक पढ़ फिर सदाक़त का, अदालत का, सुजाअत का, लिया जाएगा तुझसे काम दुनिया की इमामत का।“
3- जनाब कलीम अख्तर साहब ने “इकबाल और भोपाल” के जैली उनवान पर कहा कि इंसान जिश्म से तो मर सकता है लेकिन फिक्र हमेशा ज़िंदा रहती है । अल्लामा इकबाल साहब भले ही सियालकोट मे पैदा हुए लेकिन उनकी सोच और फिक्र को हम यहाँ पेश कर रहे हैं। उन्होने भोपाल मे अल्लामा इकबाल के नाम से इकबाल लाइब्रेरी और इकबाल मैदान का ज़िक्र करते हुए और अन्य तारीख़ी पहलुओं पर अपनी बात रखी।
4- डॉक्टर आफाक नदीम साहब ने “इकबाल का पैगाम नोजवानों के नाम” जैली उनवान पर कहा कि नौजवानी का ज़माना तवानाई का ज़माना होता है । तरक़्क़ी और तनज़्ज़ुली का इन्हिसार नौजवानो पर मुनहसिर होता है। इसलिए समाज को सही रुख देना है तो नोजवानों को भी सही रुख देना होगा। उन्होने ये शेर कहा कि “मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे, कि दाना खाक मे मिलकर गुले गुलज़ार होता है।
5- जनाब मसऊद हसन साहब ने “कलामे इकबाल की खुसुसियात” के जैली उनवान पर कहा कि उनकी शेरो शायरी मे वतन से मुहब्बत, इस्लाम से मुहब्बत, एहसासे खुदी, इरफाने ज़ात और आला मकासिद के हुसूल की तालीम मिलती है। उनके शेरो शायरी ज़्यादातर नोजवानों को मुखातिब करती है। मिसाल के तौर पर अल्लामा के कुछ शेर पेश किए – खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले खुदा बंदे से खुद पुंछे बता तेरी रज़ा क्या है।, जिसमें न हो इंकलाब मौत है वो ज़िंदगी।..., एक ही सफ मे खड़े हो गए महमूदों अयाज़, न रहा बंदा न कोई बंदा नवाज़। वगैरा ।
6- जनाब प्रोफेसर शेख अजीमुद्दीन साहब ने “अल्लामा इकबाल और इश्के रसूल” के जैली उनवान पर अपनी बात पेश करते हुए जो अल्लामा के जो शेर पेश किए वो ये “जब इश्क़ सिखाता है, आदाबे खुद आगाही, खुलते हैं गुलामों पर अबरारे शहनशाही।“ “इश्क़ कुछ महबूब के मरने से मर जाता नहीं...” “बेखतर कूद पड़ा आतिशे नमरूद मे इश्क़...” “वो दाना ए सुबुल, खतम उर रुसुल, मौला ए कुल...” वगैरा शेर के जरिये इश्के रसूल का पैगाम देने की कोशिश की।
7- तो वहीं सबसे आखिर मे प्रोग्राम के महमाने खुसूसी प्रोफेसर सिद्दीकी महमूद साहब ने “असरे हाजिर मे पयामे इकबाल की मानवियत” के जैली उनवान पर अपना इजहारे ख्याल पेश करते हुए बताया कि अल्लामा ने अपनी ज़िंदगी मे जो भी नज़्म लिखीं वो पूरी इंसानियत को दायरे मे लेते हुए लिखीं । उन्होने सभी मजाहिब के मजहबी पेशवाओं पर नज़्म लिखीं, चाहे वो गुरुनानक हों, बुध्ध हों या फिर श्री राम की शख्सियत सभी से मुतल्लिक उनकी अच्छाइयों को लिखा। उनका अस्ल मक़सद इंसानी इक़दार को कायम करना था। तो वहीं अल्लामा इकबाल मगरिबी तालीमों तमद्दुन के मुखालिफ थे । क्यूंकी मगरिबी तालीम माद्दापरस्ती की शिकार है । उनके पास अक्ल, इल्म और जद्दोजहद की बुनियाद पर कामयाबी तो है लेकिन उनके पास मोहब्बत की कमी है। अगर ये चीज़ किसी के पास है तो वो मुसलमानों के पास अल्लाह की किताब कुरान की शक्ल मे है। लेकिन बदकिस्मती से मुसलमान इससे दूरी के कारण ज़िल्लतों रुसवाई का शिकार है। उन्होने इस जिमन मे अल्लामा का ये शेर कहा कि “यकी मोहकम, अमल पैहम मुहब्बत फातहे आलम। जिहादे ज़िंदगानी मे हैं ये मर्दों की शमशीरें” उनकी तक़रीर के माध्यम से अल्लामा का असल मक़सद ये है कि इन्सानों से मुहब्बत और उनका एहतराम किया जाए यहीं असल आदमीयत है।
इख्तेतामी कलेमात रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी जनाब एमडबल्यू अंसारी साहब ने पेश किए। और दुआ के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।
और इस कार्यक्रम की सफल कनवीनिंग जनाब नय्यर आलम साहब ने की।