नरसिंहपुर।
प्रशासन द्वारा शराब की बिक्री पर प्रतिबंध के बावजूद लोग शराब के नशे में मदहोश होली के फूहड़ गीतों पर झूमते हुए नजर आए।
भांग की मिठाई एवम ठंडाई इत्यादि की बिक्री भी जोरदार रही।ठंडाई विक्रेता भांग प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करने की जुगत में लगे रहे।कई जगह गली मोहल्लों में सिगरेट व बीड़ी में गांजा भरकर कश खींचते हुए दिखाई देने के दृश्य आम थे।
विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से बताया गया कि - सिर्फ लेडी डॉन के दिनभर की गांजे की बिक्री आम दिनों की अपेक्षा चार से पांच गुना ज्यादा का अनुमान लगाया जाना अतिशयोक्ति नहीं होगी!
होली पर गांजा भांग का कभी चोरी छिपे इस्तेमाल किया जाता था,लेकिन होली पर अब यह सब खुलेआम होने लगा है,जैसे अब युवाओं में ट्रेंड बन गया है।
आमतौर पर देखने में आया कि होली के बहाने लोग अश्लील हरकतों से बाज नहीं आते हैं।
चूंकि, किशोरों के पास आर्थिक तंगी होती है इसलिए वे महंगा नशा नहीं कर पाते।लिहाजा, गांजे और भांग का इस्तेमाल किया जाता है।
यदि जिले में नशे के चलन पर गौर करें तो यहां नशेडि़यों की पहली पसंद गांजा और शराब है।नशे को फैशन मान लेना युवा वर्ग की सबसे बड़ी कमजोरी है।नशे की उपलब्धता एवं पहुंच आसान होने से भी नशे की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी हुई है।नशा माफियाओं के बढ़ते प्रभाव और नेटवर्क के चलते नशे की उपलब्धता भी सहज हो गई है।जिसकी जद में एक बड़ा वर्ग आ चुका है। न केवल युवक, अपितु संभ्रात परिवार की लड़कियां भी त्योहार के नाम पर नशे का इस्तेमाल करने में पीछे नहीं हैं।चिंताजनक विषय है की नशे के जाल में लड़कियां भी फंसती जा रही है!
शासन द्वारा जब इन नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध है तो आखिर!नशीले पदार्थ युवाओं तक पहुंच कैसे रहे हैं? क्या सरकार एवं प्रशासन तंत्र चिरनिद्रा में सोया हुआ है?
क्या आम जनता के बीच पनप रही यह धारणा असत्य है की, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तौर पर "सरकारी तंत्र-नशा कारोबारी-राजनैतिक संरक्षण" की मिलीभगत से ही संचालित होता है?
आज अभियान नही बल्कि नशे के विरुद्ध मुखर होकर एक क्रांति की आवश्यकता है।