नरसिंहपुर।
आम जीवन शहरी जिंदगी का कलपुर्जा बनकर एक नियमित लय पर कदमताल कर रहा है। रोजी रोटी की जद्दो जहद के बीच झूलती इंसानी जिंदगियां सियासत की बिसात पर महज मोहरें बनकर रह गई है।दिनभर की भागदौड़ के बाद भी आने वाले कल का गहन संकट अंधकार को और भी भयावह बना देता है।
शासन और प्रशासन से आप कोई सवाल मत कीजिए,सबकुछ ठीक चल रहा है,?वैसे भी एक सोच निर्मित कर दी गई है कि, खबर पढ़ता कौन है?हालाकी पाठकों ने इस बात को झुठलाते हुए स्ट्रिंगर 24 न्यूज(नियमित पाठक लगभग 5k से 20k) के माध्यम से यह साबित किया है की खबरों को पढ़ा जाता है।
तब फिर प्रशासन के समक्ष उठती शिकायतों के अंबार भला क्या महसूस कराते हैं?शहरी चकाचौंध से दूर एक आम जीवन और भी है जो जीवन के तमाम अंधेरों से गुजरता है।
गहन अंधकार के बीच आम इंसानी जिंदगी की छट पटाहट को महसूस किया जा सकता है।
तमाम सुख सुविधाओं से लैस वर्ग के अलावा एक और वर्ग है जिसे अब भी मदद की दरकार है।शासन ने योजनाओं के माध्यम से हाथ आगे तो बढ़ाया लेकिन छीना झपटी के माहौल में शासकीय सुविधाएं दबंगो और चाटुकारों के हिस्से में पहुंचने लगी।
इंसानी जमीर मर चुका है।पैसों ने आंखों पर लालच की पट्टी जब बांध दी हो, तब किसी को और सूझे भी क्या?गुहार चीत्कार में बदलने लगती है।कहते हैं यह शासन की सख्ती है?सहमी सी आवाजें पूछती हैं, क्या शासन गरीबों के लिए भी है?
लोकतंत्र भीड़ तंत्र में ढलता महसूस होता है! आम आदमी की आंखों में ढेरों सवाल हैं।आलोचनाएं और समालोचनाए गई गुजरी बातें हो गई है।चाटुकारिता ने मुद्दों का स्थान ले लिया है।अपवाद तिलस्मी मायाजला के मोहपाश में बंधे गुणगान के स्वर्णिम गीतों से नजर में आ जाने की लालसा लिए करबद्ध कतार में हैं!अपवाद किसी भी रूप में इस बात के प्रयास में हैं कि उनके आका किसी तरह उन पर प्रसन्न होकर कुछ , , , , दे दें।
आम आदमी को हाशिए पर धकेल दिया गया है?मूलभूत सुविधाओं और मूल अधिकारों के लिए उठती हुई आवाज तो यही बताती है।
भूख,गरीबी,रोजगार,अन्याय,अत्याचार और शोषण जैसे मुद्दे चर्चाओं से नदारद हैं।लोकतंत्र के लिए यह बहुत खतरे का समय है।
सियासत इसे एक समूह की तरह पेश करती है जिसमें सब एक जैसे हैं।
समाज का वह तीन-चौथाई हिस्सा जो आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है,उसे खारिज करने की तरकीबे निकाल ली गई है।
क्या आज जिला प्रशासन की प्राथमिकता आम जनता नहीं, बल्कि धनाढ्य और व्यापारी है?
आम आदमी की चुप्पी को बेवजह समझना अनदेखी करने जैसा ही है।किंतु यह कटु सत्य है की, चुप निरर्थक बोलते रहने से कहीं अधिक मुखर है।
आम आदमी की अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता एवम अधिकारों के प्रति संघर्ष ही स्वास्थ्य-सुविधा, शिक्षा, सफाई, भोजन, स्वच्छ पानी, बिजली, घर आदि मुहय्या करवा पाएगी।
अगले अंक में जारी , , ,