नरसिंहपुर।
विचित्र है किंतु सत्य है।ग्राम पंचायत में शिकायत की जाती है अधिकारियों से गुहार लगाई जाती है तमाम मुसीबतों को झेलकर जिंदगी का जोखिम लेते हुए दस्तावेज जुटाए जाते हैं।प्रशासन की नींद खुलती है और ताबड़तोड़ कार्यवाही करना दर्शाया जाता है।सचिव और जीआरएस पर गाज गिरती है लेकिन लोक सेवक कहलाने वाला बच जाता है।प्रतिवेदन चीखते है राशि वसूली योग्य है लेकिन दबंगई और मिलीभगत मामले का गला घोंट देते हैं।कथित पत्रकार खामोशी के बदले मेवा पर सहमत रहना बेहतर समझ लेते हैं।सच सामने लाने के लिए मीडिया का मिडिया से मीडिया के लिए संघर्ष लोकतंत्र के एक और पहलू को उजागर करता है।जो बेहद डरावना है एक पत्रकार होने के नाते इस डरावने मुखौटे को देखने का अनुभव बेहद कड़वा है।
क्या ग्राम प्रधान पर प्रशासन का अंकुश बेअसर है?क्या भ्रष्टाचार की दिमक से तंत्र का कोई हिस्सा बच भी पाया है?क्या यह प्रशासन की लचर कार्य प्रणाली का नतीजा नहीं है की भ्रष्ट ग्राम प्रधान बेलगाम और बेखौफ होकर अपनी दबंगई का प्रदर्शन करता है और बाकी सभी कठपुतली बनकर रह गए हैं?
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