मां नर्मदा मनुष्य के शरीर में कहां वास करती हैं?
पौराणिक मान्यताओं और लोककथाओं के अनुसार माँ नर्मदा की सवारी मगरमच्छ है।
शास्त्रों के अनुसार, 'मकर' जल का सबसे शक्तिशाली और तीव्र गति से चलने वाला जीव है। यह जल पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने का प्रतीक है।
स्कंद पुराण के अनुसार, जब माँ नर्मदा पृथ्वी पर अवतरित हुईं, तब वे भगवान शिव के आदेश से मगरमच्छ के आसन पर ही विराजमान थीं।
जब हम अध्यात्म और योग विज्ञान की दृष्टि से देखते हैं, तो हमारे शरीर के भीतर बहने वाली ऊर्जा और नाड़ियों को पवित्र नदियों का रूप माना जाता है। इसी संदर्भ में मां नर्मदा का निवास मनुष्य शरीर के अंदर 'नाभि' और 'स्वाधिष्ठान चक्र' पर माना गया है।
योग शास्त्र के अनुसार, मनुष्य के शरीर का केंद्र उसकी नाभि है, जिसे 'मणिपुर चक्र' भी कहते हैं। ठीक इसी तरह, भौगोलिक रूप से भी नर्मदा नदी का एक 'नाभि स्थल' (हंडिया और नेमावर के बीच मध्य प्रदेश में) माना जाता है। संतों का मानना है कि शरीर की समस्त प्राण ऊर्जा का नियंत्रण इसी नाभि स्थल से होता है, और यहीं पर मां नर्मदा सूक्ष्म रूप (चेतना) में निवास करती हैं।
योग विज्ञान में रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में 'स्वाधिष्ठान चक्र' होता है। यह चक्र शरीर में जल तत्व को नियंत्रित करता है।
इस स्वाधिष्ठान चक्र का जो बीज मंत्र है और उसका जो आंतरिक प्रतीक चिन्ह है, वह मगरमच्छ ही है।
तंत्र और योग में 'वाहन करने' का अर्थ भौतिक सवारी नहीं, बल्कि "उस ऊर्जा को नियंत्रित करके उस पर विजय पाना" है। मगरमच्छ हमारी दबी हुई इच्छाओं, वासनाओं और क्रूरता का प्रतीक है। मां नर्मदा (जो कि शुद्ध आत्म-चेतना हैं) जब मनुष्य के इस आंतरिक चक्र पर जागृत होती हैं, तो वे इन सब विकारों (मगरमच्छ) को अपने वश में कर लेती हैं। इसी को "अंग पर वाहन करना" कहा जाता है।
हमारे शरीर में ७२,००० नाड़ियाँ हैं। योग ग्रंथों के अनुसार, रीढ़ की हड्डी के समानांतर बहने वाली एक विशेष सूक्ष्म नाड़ी को 'रेवा नाड़ी' (नर्मदा जी का दूसरा नाम रेवा है) कहा जाता है। जब साधक ध्यान लगाता है, तो इस नाड़ी में बहने वाला ऊर्जा प्रवाह हूबहू नर्मदा नदी की तरह शांत और आनंदमयी महसूस होता है।
बाहर बहने वाली नर्मदा नदी असल में हमारे भीतर की कुंडलिनी शक्ति और प्राण ऊर्जा का ही बाहरी स्वरूप है, जो हमारे नाभि चक्र और जल तत्व पर शासन (वाहन) करती है।
