नीरज रामटेके का मामला! (खनन विभाग की लापरवाही या एक सुनियोजित 'सिंडिकेट'?)
क्या यह सब नदियों का सीना चीरने वाले अवैध खनन सिंडिकेट को खुली छूट देने का खेल है? जब जांच करने वाली आंखें ही 'प्रभार' के अहसान तले दबी हों, तो बहती नदियों का अवैध उत्खनन कौन रोकेगा?
नियमों की बलि देकर थमाया गया यह प्रभार कहीं इसलिए तो नहीं बनाया रखा गया ताकि पोकलेन और जेसीबी बेधड़क चलती रहें और प्राकृतिक संपदा की मलाई कुछ चुनिंदा जेबों में सिमटती रहे?
आज बात करेंगे एक ऐसी कुर्सी की, जिसके नीचे नियम-कानूनों की फाइलें दबकर दम तोड़ रही हैं। बात मध्य प्रदेश के खनिज विभाग की, जहाँ कागजों पर लिखे कायदे कुछ और कहते हैं, और ज़मीन पर चलती हुई व्यवस्था कुछ और इशारा करती है।
ज़रा ठंडे दिमाग से समझिए कि प्रशासनिक तंत्र में आँखें मूँद लेने की कला किस हद तक विकसित हो चुकी है...
विश्वस्त सूत्रों के हवाले से एक बड़ी प्रशासनिक विसंगति की खबर सामने आ रही है। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए खनिज विभाग में जो खेल चल रहा है, क्या वो बिना प्रशासनिक शह के संभव है?
क्या है पूरा गणित? समझिए!
जानकारों के मुताबिक खनिज निरीक्षक का पद MPPSC से भर्ती होता है, 2800 पे-ग्रेड का कार्यपालिक पद है। इसके लिए भू-विज्ञान में ग्रेजुएशन अनिवार्य है!
वहीं व्यापम से भर्ती सहायक मानचित्रकार का पद 2400 पे-ग्रेड का है, जिनका प्रमोशन नियमतः केवल मानचित्रकार के पद पर हो सकता है!
जिस पद के लिए भू-विज्ञान में डिग्री अनिवार्य है, क्या उस पद के प्रभार पर बैठे कर्मचारी के पास यह विधिवत योग्यता है? यदि नहीं, तो किस नियम के तहत यह प्रभार जारी है?
इस मनमानी व्यवस्था पर जिम्मेदार अधिकारियों और शासन का मौन कई बड़े सवाल खड़े करता है।
वैकल्पिक या अस्थायी व्यवस्था के रूप में दिया जाने वाला प्रभार इतने वर्षों तक बिना शासन के किसी स्पष्ट/स्थायी आदेश के किस आधार पर जारी रखा गया है?
नियमों को दरकिनार कर इस प्रकार प्रभार बनाए रखने के पीछे संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की क्या मंशा है?
नियम जब किसी आम नागरिक पर लागू होते हैं, तो बुलडोज़र की रफ्तार से चलते हैं! लेकिन जब बात किसी चहेते को प्रभार देने की आती है, तो फाइलें दराजों में सो जाती हैं।
क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है या इसके पीछे अवैध खनन और सांठगांठ का बड़ा खेल छिपा है?
नियमों को ताक पर रखकर चलाए जा रहे इस 'सिंडिकेट' पर शासन चुप क्यों है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर गाज़ गिरेगी या फाइलों में खेल यूं ही चलता रहेगा?
