*अक्सर लोग पूछते हैं कि आर्थिक विषमताओं के बाद भी आप रोटी बैंक और अन्य सामाजिक कार्यक्रम क्यों चला रहे हैं?*
लॉक डाउन के बाद इस दौरान मेरी जिंदगी बिल्कुल आम हो गई थी। कुछ लोगों को यह अहसास हो जाता है कि वे अपनी जिंदगी में क्या करना चाहते हैं, जिससे उनकी जिंदगी तो बदल जाती है लेकिन मेरी भावनाएं सामाजिक दबाव के आगे हार मान लेती हैं। पत्रकारिता से होने वाली आय भी बेहद सीमित हो गई थी। रोज सुबह उठना, काम पर जाना, काम से वापस आना, खाना, सोना जाना, अगले दिन काम पर जाना, ऐसा लग रहा था मानो मै मशीन बन गया हूं।
एक दिन मेरे साथ एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने मेरी जिंदगी बदल कर रख दी। मैंने देखा कि कुछ बच्चे सुभाष पार्क के पास कूड़े के ढेर में खाना तलाश कर रहे थे।
वह देखकर मैं सुन्न रह गया,क्यों कि मेरे लिए वे बच्चे महज़ एक संख्या नहीं थे।
लोग अपने जीवन में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे अपने से कम भाग्यशाली लोगों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। मैं अजीबो-गरीब कशमकश में फंस गया था कि अपने दिल की सुनूं या दिमाग की। दिल कह रहा था कि सारी फिक्र छोड़कर उन यतीम बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए , जबकि दिमाग कह रहा था कि, छोड़ उन लावारिस बच्चों की चिंता और जिंदगी जैसी चल रही है वैसे ही चल रही है लेकिन मेरी अंतरात्मा ने मुझे उन बच्चों के खास जीवन से मुंह नहीं मोड़ने दिया।
एक बार के लिए मुझे लगा कि मैंने यह नहीं कर सकता लेकिन मेरे अंतरात्मा ने मुझे रोक लिया।
जब बच्चे करीब आए तो मुझे उनका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था। उनकी हँसी-मज़ाक, उनके पीले टूटे दाँत, उनके दोस्तों के पिता के मारपी निशान, बच्चों ने मुझे बताया कि लोग उन्हें बिना वजह पीटते हैं। उन्हें बचपन से ही ज़बरदस्ती नशे का आदी बना दिया गया।
उनके दृश्यों को देखने के लिए मेरे लिए सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। मुझे इस बात का डर था कि जहां मैं उन बच्चों को बेहतर जिंदगी का वादा करने का वादा करता हूं, तो कहीं उनका विश्वास ना टूटे,, लेकिन इतना तो तय था कि मैं अपना मुंह नहीं मोड़ पा रहा था।
मुझे इस बात का एहसास नहीं था कि मुझे समाज के कथित सहयोगियों के साथ अपने दोस्तों के विरोध का सामना करना पड़ा था। मेरे दोस्तों ने मुझे चेतावनी दी कि यह काम मेरे लिए सुरक्षित नहीं है। मेरे साथ काम करने वाले लोगों ने मुझसे कहा कि वे बच्चों की मेरी जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने मुझसे कहा यह तर्क भी दिया कि बच्चों की देखभाल करना सरकार का कर्तव्य है ना कि मेरा!
मैंने अपने इस अनुभव से यह सीखा कि हमारा पहला कदम कितना छोटा क्यों न हो, हमें उसे उठाने में देर नहीं करनी चाहिए। वह पहला कदम ही हमें आगे ले जाता है। कई बार हमें ऐसा लगता है कि हमारे एक कदम उठाने से क्या फर्क पड़ता है, कौन सा बड़ा बदलाव आता है लेकिन अगर हम सभी एक कदम से कदम मिलाकर चलें तो हम समाज में बेहतर बदलाव ला सकते हैं।
मैंने अपने प्रयास को आगे बढ़ाया और उसे रोटी बैंक का नाम दिया। पहले दिन ही दस से बारह बच्चों को भोजन पैकेट पहुंचाए गए।हमने अपनी शुरुआत छोटे से ही की।
दिनभर की भागदौड़ के बाद लावारिस के बच्चों को खाना मिलाना मेरी चुनौती का हिस्सा बन गया और तब से आज चार साल बाद गुजर जाने के बाद भी रोटी बैंक का काम जारी है।
