।। विवेचना ।।
सच बोलना गुनाह है!वैसे भी सच बोलने की जरूरत ही क्या है?जब झूठ से काम चल जाता हो तब सच की कीमत वैसे भी कहां रह जाती है?सच तो बेदाम है,अनमोल है।कीमत तो झूठ की होती है।
ग्राम पंचायतों में गबन हुआ तो होने दो, अधिकारी रिश्वत खोरी करते हैं तो करने दो,नशा,जुआ, सट्टा पैर पसारता है तो पसारने दो।कोई शोषण का शिकार होता है तो होने दो, गरीब लूटता है तो लुटने दो, मिलावट खोरी कालाबाजारी होती है तो होने दो, विकास विनाश में ढलने लगे तो ढलने दो।सच बोलना ही क्यों है?
क्या मिलता है सच बोलकर?
सच बोलोगे लिखोगे तो उनकी आंख की किरकिरी बन जाओगे,जो उन्हें अच्छा नही लगेगा! देखा नही क्या तुमने,सच का अंजाम क्या होता है?और यह कोई आज हो रहा है क्या?यह तो सदियों से चला आ रहा है।
झूठे को कौन डरा सकता है?झूठों से तो सब वैसे ही डरते हैं।डराया तो सच को जाता है,दबाया सच को जाता है।
देखो सच बोलकर तुमने कौन सा तीर मार लिया?कुछ लोगों के दिलों में जगह ही बना ली ना,लेकिन कितनो की आंख में खटक रहे हो,इसका अंदाजा है तुम्हे? वो नही चाहते सच लोगों तक पहुंचे!लोग जागरूक बने!
और तुम ठहरे बेवकूफ!चले गए पहाड़ों पर लोगों को जगाने समझाने,और फिर चले भी गए थे तो उनके अधिकारों के लिए लड़ने क्यों बैठे? क्या जरूरत थी?बरसों से मर रहे हैं तो मरने दो!तुम्हारी खुद की जिंदगी का तो भरोसा नहीं और देश सेवा करने निकल पड़े।कोई करता है क्या ऐसा?लोग महान बातें अक्सर बोलते बस हैं और इतने में ही उनका काम चल जाता है।तुम ठहरे सेंटी टाइप इंसान!लगा बैठे दिल लोगों से!लगे जूझने उनकी समस्याओं के लिए!सरासर पागलपन नही तो और क्या है?
गर्भवती का बच्चा ना मरने पाए, तो तुम लगे लड़ने, बच्चों तक शिक्षा क्यों नहीं पहुंची तो तुम लगे लड़ने, किसी बेवा की गरीबी भूख बर्दाश्त नहीं हुई तो तुमने कलम की मशाल जला ली।
बस यहीं पर दिक्कत है!यह कलम की मशाल नही जलना चाहिए,यह उन्हे पसंद नहीं है,उन्हे अंधेरा पसंद है,क्यों की अंधेरे में ही तो काले कारनामों को अंजाम दिया जाता है।उजाले में उजले कपड़ों के पीछे सारा अंधकार छिप जाता है।
तुम भी कमाओ और उन्हें भी कमाने दो!सच को एक तरफ जाने दो!
