https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_nXYDircpji_NBp4Y2oyo8rhVeU-DuXusJaP3AW8


 


 


 


यह कैसा विकास है ? : नरसिंहपुर।

28 साल की प्रीति (परिवर्तित नाम) मुझसे अपने गांव की समस्या बता रही थीं। हरे भरे विशाल व्रक्षो, झाड़ियों और लताओं से ढकी घाटियों, ख़तरनाक पहाड़ी रास्तों और नदी के ऊपर से गुज़रकर जाना।

बहुत रमणीय दृश्यावली के बावजूद यहां का जीवन बहुत ही कठिन है।

थोड़ी सी चूक हुई तो आप हज़ारों फ़ीट गहरी खाई में गिर सकते हैं। खैर जैसे तैसे हम उबड़-खाबड़, पथरीले रास्तों से होकर गांव पहुंचे, तो हमारी मुलाक़ात धीरज भरिया और प्रीति से हुई।

प्रीति ने बताया कि बारिश के दौरान इतनी बारिश होती है कि हमारे सारे काम बंद हो जाते हैं, बारिश के नदी-नाले पानी से लबालब भर जाते हैं और आस पास के इलाकों से हमारा संपर्क टूट जाता है।आप कल्पना भी नहीं कर सकते की उस दौरान इन परिवारों पर क्या गुजरती है।

हम यहां मात्र एक उदाहरण दे रहे हैं, लेकिन इस तरह के उदाहरण आपको जिले के विभिन्न अंचलों में देखने को मिलेंगे।

आप इस क्षेत्र की किसी भी महिला से बात करें तो आप पाएंगे कि सड़क और बिजली के मुद्दे पर वो बेहद संवेदनशील हैं, ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान इसका कारण भी स्पष्ट समझ आता है।

प्रीति और उनके जैसे ही अनेक परिवार शहर में जाकर बसना चाहते हैं, जहां सड़क,बिजली,पानी अस्पताल मिलेगा और उन्हें किसी भी समस्या पर समाधान के लिए दूर जाना नहीं होगा।एक बार में यह सब बोलकर आदिवासी महिला प्रीति खामोश हो जाती है।

स्टोरी कवरेज के दौरान मैंने एक गर्भवती महिला को सिर पर बोझ उठा कर पहाड़ चढ़ते देखा था।दिल तब कचोटता है, जब बिजली न होने से कई मौक़े पर सगाई विवाह के रिश्ते टूट जाते है, बेटी की शादी हो जाने पर भी दामाद गांव ही आना नहीं चाहते।

महिलाएं और परिवार के दूसरे सदस्य पहाड़ी रास्ता पार कर अस्पताल पहुंचने में गर्भवती महिलाओं की मदद करते हैं, लेकिन कई बार सड़क तक पहुंचने की कोशिश नाकाम भी हो जाती है।महिलाओं का नियमित स्वास्थ देखभाल नहीं हो पाता है, गर्भवती महिला को वक़्त से पहले ब्लीडिंग या अचानक बेहद दर्द होने जैसे कई मामलों में उन्हें तुरंत कोई चिकित्सकीय सहायता तक नहीं मिल पाती।

सच तो यह है की, विकास हुआ है मगर जिन वर्गों का होना चाहिए था उनका नहीं हुआ है।इस विकास का फ़ायदा ग्रामीण या आदिवासी क्षेत्रों तक नहीं पहुँच रहा है।विकास की ये बयार अभी सबको नहीं छू पाई है।

गांव के किसी घर में टीवी, रेडियो नहीं है, सांझ ढलते ही पूरा गांव वीरान हो जाता है, भरिया समुदाय को अब चिंता इसकी है कि बुनियादी सुविधाएं ना मिलने से बच्चों का भविष्य चौपट हो रहा है।

सरकारी तंत्र और प्रशासनिक कारिंदे दंभ भरते हैं कि विकास का पहिया तेज़ी से घूम रहा है, तो वह पहिया धीरज भरिया के गांव क्यों नहीं पहुंचा?

उससे बड़ी तक़लीफ यह है कि बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पा रही है, ग़रीबी है।

पर कहानी यहां ख़त्म नहीं होती।

रुक्मणि (परिवर्तित नाम) कहती हैं कि,यह आदिवासियों का गांव है, हमारा विकास हो, इसकी चिंता किसे है।ढिबरी युग में जीना ही हमारी किस्मत है, बिजली,सड़क के बिना तो हम मानों जंगली ही रह गए।हमें सड़क अस्पताल और दवाओं की दुकानें चाहिए, हम एक तरह से इस पहाड़ी में फंस गए हैं, इस तरह का कठिन सफ़र करते हुए ना जाने कितने लोग मौत की गोद में समा चुके हैं।

कुकड़ी पानी:पटकना:तैलैया: बड़ा गांव:(मोहपानी:चिचली:नरसिंहपुर।)



Previous Post Next Post

📻 पॉडकास्ट सुनने के लिए यहां क्लिक करें।

🎙️ Stringer24News Podcast

🔴 देखिए आज का ताज़ा पॉडकास्ट सीधे Stringer24News पर