।। समीक्षा ।।
बदलाव तो आया है! पर कहां ?
शहरी क्षेत्र में! कितना ?
ग्रामीण पहाड़ी इलाकों में!
आप कहेंगे की इस विषय पर पहले भी अनेक चर्चाएं और लेख हो चुके हैं! फिर इसकी आवश्यकता क्या है?
जिले की प्रशासनिक व्यवस्था विगत एक वर्ष में औसत रही तो यह कहना अनुचित नहीं होगा! आमतौर पर मुद्दों और शिकायतों पर प्रशासनिक उपेक्षा की खबरों से अखबार भरे रहे।
ग्रामीण इलाकों में आज भू माफिया, रेत माफिया, शराब माफिया और भ्रष्टाचार का साया गहराता जा रहा है।बात गांगई की हो,जोहरिया की या फिर केरपानी या सालीचौका की अवैध कच्ची शराब और गांजा सट्टा जैसी बुराइयां समाज में फैलती जा रही है।
रिश्वत खोरी, गबन, हेर फेर, भ्रष्टाचार के सैंकड़ों मामले उठे खबरों में छाए और फाइलों के गहरे समुंदर में गुम गए।कुछ पर छूट पुट कार्यवाहियां हुई! लेकिन अधूरे और विलंब से मिले न्याय का आम जनता को कितना फायदा हुआ? यह जानने की जहमत तन्त्र के कारिंदो ने नही उठाई!
नरसिंहपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में कितने लोगों से मनरेगा मजदूरी के नाम पर ठगा गया?
कितने लोगों के सर पर अधूरी छत लेंटर होने का इंतजार कर रही है?
कितने बच्चे आज भी शिक्षा से वंचित हैं?
कितने बच्चों के मुंह से मिड डे मील का निवाला छीन कर बाजार की आग में झोंक दिया गया?
कितनी माताओं की कोख सिर्फ इस वजह से उजड़ गई क्यों की समय पर अस्पताल नही पहुंच सके?
कितनी बहनें इसलिए विधवा हो गई क्यों की रात को चिकित्सक और चिकित्सालय का इंतजाम नहीं था?
कागजी सरकारी आंकड़ों का धरातल से मिलान सम्भव है?
ऐसे और भी अनेकों सवाल है जिनके जवाब प्रशासन दे सकता है!लेकिन फिलहाल तो आशा की कोई किरण दिखाई नही दे रही है!
वहीं शहर के हालात पर गौर करें तो मुख्य मार्ग एवम शहर के पाश एरिया के अलावा आंतरिक गली मोहल्ले में अतिक्रमण से लेकर,साफ सफाई जैसी अन्य अनेकों समस्याएं सर उठाए हुए हैं।शहरी और गांव की अनेक विसंगतियों में समानता ही होती है, कोई विशेष अंतर नजर आता नही है।
बाजार और बाजार का स्वरूप अवश्य बदला है।आधुनिकता के असर और तकनीक के उपयोग ने युवाओं के लिए अनेक अवसर के द्वार अवश्य खोलें है लेकिन सरकारी नौकरियों का हाल देश के अन्य हिस्सों जैसा ही है।
प्राइवेट संस्थान में ना सिर्फ कम वेतन बल्कि शोषण आम बात है।श्रम विभाग को सुध लेने की फुरसत नहीं है।
रेस्टोरेंट,हॉस्पिटल, क्लॉथ शॉप और गिफ्ट स्टोर अथवा अन्य मझौले उद्योग में कार्यरत कर्मी तीन से चार हजार रुपए के वेतन पर बारह तेरह घण्टे काम करने के लिए मजबूर हैं।ना कोई ओवर टाइम, ना समुचित पेयजल व्यवस्था, ना आराम करने की कूज अन्य व्यववथा।
सस्ते श्रम का उपयोग पूंजीपति भलीभांति कर रहे हैं।शोषण के इस चरम पर भी बेरोजगार वर्ग के पास अन्य कोई विकल्प सामने नहीं है?
वहीं स्थानीय स्तर पर प्रशासन ने बाजार के विस्तारीकरण और सजावट के मुद्दे को उपेक्षित ही रखा है। चौपाटी की तर्ज पर शहर के विभिन्न हिस्सों में सब्जी और ओपन स्टाल मार्केट विकसित कर रोजगार के अवसर में वृद्धि की जा सकती है, लेकिन शहर में इस तरह के प्रोजेक्ट पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है,नतीजे सड़क पर अराजक यातायात, अव्यवस्था और दुर्घटनाओं के रूप में सामने आते हैं।
सड़क तक फैले दुकानदारों के स्थाई और अस्थाई अतिक्रमण को हटाकर पैदल चलने वालों को फुटपाथ की सौगात दी जा सकती है लेकिन पूंजीपतियो की राह में रोड़ा कौन बने?वैसे भी पैदल चलने वालों से मिलता ही क्या है?वो कोई इंसान थोड़े ही है!
बरसों बाद भी शहर एक अदद ऑटो स्टैंड के लिए तरस रहा है। धूप गर्मी और बारिश के मौसम में सर छुपाने के लिए ऑटो चालकों के लिए शेड की कोई व्यवस्था नहीं है। रेलवे स्टेशन हो,बस स्टैंड या फिर अस्पताल क्षेत्र कहीं भी ऑटो स्टैंड की जरूरत महसूस नहीं की गई! ऑटो चालकों के नशे से बचाव और स्वास्थ्य की दिशा में कोई सकारात्मक कदम उठाए गए हों,ऐसा फिलहाल दिखाई नही देता है!
