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नरसिंहपुर

अपने खेत-खलिहान, अपनी ज़मीन और अपनी संस्कृति छोड़ एक नए आशियाने की तलाश में:

भले ही जिले में विकास रथ डगर डगर घूम घूम कर सरकार के गुणगान का बखान कर रहा हो,लेकिन विकास रथ की टीवी स्क्रीन पर दिखने वाले विकास को लोग जमीन पर नहीं ढूंढ पा रहे हैं।मध्यप्रदेश भाजपा सरकार में आदिवासियों में नाराजगी थमने का नाम नहीं ले रहीं है। 

आज भी जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र अपनी दुर्दशा पर आसूं बहा रहे हैं। अशिक्षा और जागरुकता के अभाव में आदिवासी परिवार सरकार द्वारा चलाई जा रही अधिकतर योजनाओं के लाभ से वंचित हैं। उन्हें नहीं पता कि वह योजना का लाभ किस प्रकार ले सकते हैं।

अगर हम उनके घरों के बारे में बात करें तो उनका कच्चा झोपड़ी नुमा मकान होता है। जो फूस ,खप्पर का बना होता है और अपने मकान के चारों ओर लकड़ी का घेराव किए रहते हैं। आदिवासी समाज मुख्यतः सामूहिकता की भावना पर आधारित होता है। प्रकृति से जुड़ाव होने तथा उसे आत्मसात करने की जो प्रवृत्ति आदिवासी समाज में देखने को मिलती है वह किसी अन्य संस्कृति में नहीं मिलती है ।आदिवासी समाज में किसी भी कार्य को करने का अपना एक अलग तरीका होता है।यह तरीका आदिवासियों के अलग-अलग समुदायों में अलग होते हैं। ज़्यादातर आदिवासी समुदाय प्रकृति पूजक होते हैं।

हमने अपनी रिपोर्टिंग के दौरान यह पाया कि ज़िम्मेदार अधिकारीयों द्वारा आदिवासी ग्रामवासियों की समस्याओं को नहीं सुना जाता।

आज आदिवासी क्षेत्रों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है, कहीं सड़क नहीं तो कहीं पानी की कमी,आदिवासी समुदायों के पास ना तो रोजगार का कोई साधन है ,और ना ही किसी सरकारी योजनाओं का लाभ समय पर प्राप्त हो रहा है आलम यह है कि आज,आदिवासी पलायन के लिए मजबूर हो रहे हैं।

वैसे तो आदिवासियों को जंगल का रखवाला कहा जाता है। लेकिन, आज उन्हीं आदिवासियों को अपने जंगलों को छोड़कर दूसरी ओर जाना पड़ रहा है। मुख्यतः दो तरह के पलायन देखे जाते हैं। एक तो लम्बे समय के लिए और दूसरा छोटी अवधि के लिए। 

नागरिक सुविधाएं प्रदान करने के लिए खाली वादे किए गए ! लेकिन सरकार ने सुविधाओं पर करोड़ों रुपए खर्च करते हुए शहरों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई?

फिलहाल आदिवासियों के पलायन का कोई सरकारी आंकड़ा stringer24news के पास उपलब्ध नहीं है लेकिन सामाजिक विश्लेषकों का अनुमान है कि पलायन करने वालों की तादाद अधिक हो सकती है,हालाकी इसमें मौसमी पलायन करने वालों की गिनती अधिक है।

मैंने भी सोचा कि, आदिवासियों की जिंदगियों को करीब से देखा जाए।मोहपानी, गोटीटोरिया, भिल्मा ढाना का दौरा करते हुए इतना तो समझ में आया कि पलायन का एक बड़ा कारण है प्रशासन और लोगों के बीच में अविश्वास का माहौल और बुनियादी सुविधाओं का अभाव।

 जारी : 
अब जिस गांव के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं, आप जानकर हैरान रह जाएंगे की इतने मुश्किल हालात में कोई इंसानी जीवन की कल्पना कैस कर सकता है,











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