https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_nXYDircpji_NBp4Y2oyo8rhVeU-DuXusJaP3AW8


 


 


 


सुनो अगली बारिश में तुम जरूर आना।

।। रविवारीय विशेषांक ।।

सुनो इस बार फिर हमारे गांव में बारिश आई थी लेकिन अब तुम कहोगे की,बारिश तो हर बार ही आती है इस बार भी आई थी तो इसमें नया क्या है। हां, सच ही कहा तुमने कुछ भी तो नया नहीं है।

हमारे गांव की बारिश तुम्हारे शहर की बारिश की तरह खूबसूरत नही की , चाय पकोड़े खाकर बारिश की बूंदों का आनंद लो। यहां तो बारिश आफत की बारिश होती है।

पिछली बार भी तो रजनी काकी का मकान डूब गया था बारिश में,लेकिन इस बार उनके घर की दीवाल ढह गई है।

गांव के पास वो बड़ा नाला है ना तीन दिन तक उस पर पानी था,ना अस्पताल जा पा रहे थे ना बाजार। सगुना चाची ने सवा पाई भर मक्का दिया था, रात को बच्चों को वही खिलाकर सुलाया था।

तुम्हे पता है स्कूल और हाट बाजार के पूरे परिसर में घुटनों तक पानी भर गया था और बदनसीबी देखो की। उसी रात रज्जू का लड़का भी बीमार था और जलभराव के कारण एम्बुलेंस नही पहुंच पाई , कहते हैं रात भर तड़पा सुबह खत्म हुआ बेचारा।कुछ भी तो नया नहीं है ना लेकिन इसमें। हर बार ही तो ये बारिश किसी न किसी की जान लेकर ही मानती है।

जानते हो तालाब किनारे पुराने बरगद के पास वो जो लगड़ी काकी रहती है ना,उनका तो चूल्हा ही बारिश खा गई,बेचारी चल नही सकती अपनी आंखों के सामने अपनी टूटी फूटी गृहस्थी को देख रात भर रोटी रहीं,सुबह जब हरिया खेत जाने के लिए वहां से गुजरा तो उसने फिर लंगड़ी काकी की मदद की।लेकिन मैं तुम्हे यह सब बताकर परेशान क्यों कर रहा हूं, तुम तो यही कहोगे न की,कुछ भी तो नया नहीं है इसमें।

देखो वहां शहर में बैठकर दावा करते हो की,गांव की हालत बदल गई है लेकिन एक बार यहां आकर तो देखो। हां,लेकिन जब आओ तो ये कैमरे दूर छोड़कर आना,हो सके तो अपने लाव लश्कर को भी दूर छोड़कर आओ,और एक पूरा दिन हमारे साथ बिताओ।

ये अधिकारी कागजों से कैसे समझाते होंगे समस्याएं?और कैसे समझ पाते होगे तुम? क्या गांव को भी कभी शहर में बैठकर समझा जा सकता है?तुम कैसे सरकारी बाबू हो जो इतनी सी बात भी नही जानते की,गांव को शहर में बैठकर नहीं समझा जा सकता है।

कुसुम भाभी अपनी आंखों से पहले से ही लाचार थी और उनके पति को बारिश में किसी जहरीले कीड़े ने काट दिया, रम्मू को शरीर के एक हिस्से में लकवा सा मार गया है, चार दिन से तो मजदूरी मिली ही नही थी,फांकों में दिन गुजार रही है।क्या तुम इस दर्द को कागज पर समझ पाओगे?

देखो हर बार सुनता हूं, शहर से बड़े साहब आने वाले हैं लेकिन अबकी बार कोई बहाना मत बनाना।सुनो अगली बारिश में तुम जरूर आना।

।। व्यंग्य।।









Previous Post Next Post

📻 पॉडकास्ट सुनने के लिए यहां क्लिक करें।

🎙️ Stringer24News Podcast

🔴 देखिए आज का ताज़ा पॉडकास्ट सीधे Stringer24News पर