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ग्राम पंचायत खुरपा।

गांव के अंदरूनी हिस्सों में झांककर देखें तो आम गरीब मजदूर का जीवन उम्मीदों और आसुओं से परिपूर्ण दिखाई देता है।मजबूरी,बेबसी और लाचारी की लकीरें चेहरे की उदासी को और भी बढ़ा देती है।

ग्रामीण कहीं न कहीं यह तो स्वीकारते हैं की काम पूरा कराने के लिए पैसों की मांग की गई,200/- रू से लेकर 5000/- रू तक सरकारी योजना का लाभ दिलाने के नाम पर मांगे गए,इतना ही नही कुछ ग्रामीणों ने तो बकायदा पैसे देकर काम करवाया भी है, किंतु जब उनसे यह पूछा जाता है की किसने पैसों की मांग की तो चुप्पी साध ली गई।

पहली दफा में ही मामला संगीन और संदिग्ध लगता है।ग्रामीण आपस में कुछ इशारे करते हैं उसके बाद सभी इधर उधर की बातों में व्यस्त होने का अभिनय कर बात को टालने की कोशिश करने लगते हैं।

गांव के परिदृश्य पर ध्यान दें तो पाते हैं कि, पंचायत में रसूखदारों की आपसी खींचतान ने हालात को असहज बनाया हुआ है।

सरपंच और सचिव पर तमाम तरह के आरोप और प्रत्यारोप मिथ्या है या सच का ही एक पहलू इस विषय पर विस्तृत विश्लेषण आवश्यक है किंतु क्या इस आपसी खींचतान और आंतरिक कलह की वजह कहीं भ्रष्टाचार तो नही है यह जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण।


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