जब विभागीय जिम्मेदारों और लोक सेवकों पर निजी स्वार्थ और भाई भतीजावाद हावी हो वहां किसी भी तरह से लोकतंत्र जीवित कैसे रह सकता है?
मैं उन मुद्दों की बात करना चाहता हूं, जिस पर तमाम तमशों के बावजूद भी विभिन्न माध्यम अब तक कोई बात नहीं कर पाए हैं।
स्ट्रिंगर 24 न्यूज आखरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज को शासन प्रशासन के कानों तक पहुंचाने का भरसक प्रयास करता है।
ग्राम पंचायतों भ्रष्टाचार के मामलों में जो कुछ भी हो रहा है,अधिकांश मामलों को हल्का करके ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की जा रही है, और मैं ये भी जानता हूं, कि वो इस मकसद में कामयाब भी हो जाएंगे।
तमाम विश्लेषण और आंकड़े यह संकेत कर रहे हैं कि, भ्रष्टाचार के समर्थक धनबल और बाहुबल के दम पर लोकतंत्र का गला दबाने की कोशिश कर रहे हैं।
आज ना सिर्फ ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है बल्कि भ्रष्टाचारियों के हाथ इतने लंबे हैं कि वे किसी भी तरह की पूछताछ और जांच की पहल को बड़ी ही आसानी से प्रभावित कर सकते हैं।
ग्राम पंचायतों में बढ़ते भ्रष्टाचार के मामलों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।यह जवाबदेही प्रशासन की है कि वो ऐसे मामलों को जल्दी नतीजे पर पहुंचाये।
निजी स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ के चलते विकास के ढांचे को जर्जर बनाया जा रहा हैं।
अधिकारी, अपराधी को संरक्षण देता है, वहीं नेता, अधिकारी और अपराधी दोनों की रक्षा करते हैं इस प्रकार के आरोप धरने और आंदोलन के जरिए लगते रहे हैं वहीं सोशल मीडिया पर भी युवा अपनी आवाज बुलंद करते रहे है।
भ्रष्टाचारियों द्वारा खुलासों की असलियत को छिपाने की कोशिश रहती है।
इसका सजीव और विस्तृत नज़ारा हमने देखा है।
"जांच जारी है,शीघ्र ही उचित कार्यवाही की जायेगी" भगवान जाने ये कैसा बयान है, मैं तो मानता हूं कि ये बयान अक्सर जले पर नमक छिड़कने जैसा काम करता है।
क्या आज प्रशासन आम जनता के प्रति उत्तरदायी होने के बजाय भ्रष्टाचारियों के प्रति कृतज्ञ है!
जहां एक और जिले के निवासी तमाम समस्याओं से जूझते हुए न्याय और शिकायत की कतार में खड़े हैं वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार अपनी कुर्सी को पकड़ कर बैठे हैं।
प्रशासन के रवैये में सुस्ती दिखाई दे रही है, और तो और ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे प्रशासन को पता ही नहीं कि बढ़ती मंहगाई,अराजकता और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर उसे क्या करना चाहिए।
जब तक जबावदेही तय नहीं होगी तब तक हालात बदतर रहेंगे।लोग कीड़े मकोड़ों की जिंदगी जीते रहेंगे और जिम्मेदार चिलचिलाती गर्मी में एसी के आवरण में ही बैठे रहेंगे।
यह काला अक्सर सत्य साबित भी हुआ है कि जो लोग एसी कमरे में योजनाएं बनाते हैं कई बार उनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता है।
अगर प्रत्यक्ष देखना है तो गांव में बसी गरीब मजदूरों की झोपडियों में जाकर देखो।
अगले अंक में जारी -
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